बिहार पवेलियन में पारंपरिक विधि से तैयार मखाना के साथ लखपति दीदी। जागरण
वरुण त्रिवेदी, गुरुग्राम। ग्रामीण हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों के संगम बने सरस आजीविका मेले में इस बार बिहार के मखाने लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। खास बात यह है कि मखानों को पूरी तरह पारंपरिक विधि से तैयार किया गया है, जिसकी प्रस्तुति लखपति दीदी गीता स्वयं कर रही हैं।
गीता ने बताया कि तालाब में बीज डालने के लगभग छह माह बाद तैयार फसल को निकाला जाता है। इसके बाद बीजों को टोकरी में इकट्ठा कर धोया और धूप में सुखाया जाता है।
अंतिम चरण में रेत के भीतर लकड़ी से पीटकर मखाने तैयार किए जाते हैं। शुद्धता और देसी तरीके से निर्माण के कारण इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। लोग न सिर्फ स्वाद के लिए बल्कि स्वास्थ्य लाभ को ध्यान में रखते हुए भी मखाने खरीद रहे हैं।
बिहार पवेलियन में घरेलू उत्पादों की भी भरमार
लेजर वैली ग्राउंड में लगे इस मेले में देशभर से आए स्वयं सहायता समूहों ने अपने हस्तनिर्मित उत्पाद प्रदर्शित किए हैं। बिहार पवेलियन में मखानों के साथ-साथ स्टाल पर मसाले, चना का सत्तू, धनिया पाउडर, अदौरी पाउडर और मखाना पाउडर भी उपलब्ध हैं। सभी उत्पाद घरेलू और प्राकृतिक विधि से तैयार किए गए हैं। ग्राहकों का कहना है कि बाजार में मिलावट की चिंता के बीच ऐसे शुद्ध उत्पाद भरोसा दिलाते हैं।
लाख की चूड़ियों में परंपरा की चमक
पवेलियन में दूसरी ओर सईदा खातून द्वारा प्रस्तुत लाख की चूड़ियां भी महिलाओं को खूब भा रही हैं। पश्चिम बंगाल और रांची से मंगवाई गई लाख को भट्ठी में पिघलाकर उसमें रंगीन पत्थरनुमा लाख मिलाई जाती है। फिर चूल्हे पर गर्म कर रस्सीनुमा आकार देकर कड़े के साइज में काटा जाता है। मजबूती के लिए इनमें तार भी डाली जाती है। पारंपरिक तकनीक से तैयार ये चूड़ियां सुंदरता और टिकाऊपन का संगम प्रस्तुत कर रही हैं। |