प्रकृति की गोद में बसा धौलास सुबह सुनहरी आभा में नहाता और सांझ ढलते ही पहाड़ियों की गोद में सिमट जाता है. Jagran
अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। मैं धौलास बोल रहा हूं...। उत्तराखंड में मुस्लिम शिक्षण संस्थान की जमीन पर प्लॉटिंग के कारण मैं सुर्खियों में आ गया हूं। मेरे नाम के संग कृषि भूमि के सौदों की चर्चा जुड़ गई है। डेमोग्राफी परिवर्तन की बहस भी शुरू हो गई है।
शासन-प्रशासन की नजरें मुझ पर टिक गई हैं। कागजों पर बदली मेरी तस्वीर ने अचानक मुझे संवेदनशील क्षेत्र बना दिया है। पर मेरी पहचान केवल विवादों तक सीमित नहीं है। मैं सिर्फ रजिस्ट्री और सीमांकन का विषय नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक हूं।
हरियाली का संसार
मैं देहरादून की भागती सड़कों से हटकर हरियाली का संसार हूं, शिवालिक की तराई में पसरा मेरा क्षेत्र सुबह की पहली किरण के साथ सुनहरी आभा में नहाता और सांझ ढलते ही पहाड़ियों की गोद में सिमट जाता हूं। मेरे आंगन में वर्षों से साल और सागौन के वृक्ष प्रहरी की तरह खड़े हैं, जिन्होंने समय को बदलते देखा है।
शासन बदलते, पीढ़ियां गुजरते और रास्ते बनते देखे हैं। बरसात में जब बादल नीचे उतरते हैं, तो वे मेरे कंधों पर ठहर जाते हैं। ओस की बूंदें मेरी पत्तियों पर मोतियों-सी चमकती हैं। पक्षियों की चहचहाहट मेरे सन्नाटे को संगीत में बदल देती है। मेरे खेतों की मेड़ों पर चलती पगडंडियां आज भी उन कदमों की आहट पहचानती हैं, जो पीढ़ियों से यहां की मिट्टी से जुड़े रहे हैं।
भौगोलिक रूप से मैं देहरादून घाटी का वह हिस्सा हूं, जहां पहाड़ और मैदान एक-दूसरे को थामे खड़े हैं। मेरी मिट्टी में नमी है, हवा में ठंडक है। वन और कृषि भूमि का मेल मेरी जैवविविधता को संजोए हुए है। छोटे जलस्रोत और वर्षा से उपजे प्रवाह मुझे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील बनाते हैं। मैं केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, प्रकृति की सतत धड़कन हूं।
इतिहास के पन्नों में भी मेरी उपस्थिति दर्ज है। गढ़वाल अंचल की सांस्कृतिक छाया मुझ पर पड़ी है। अंग्रेजी काल के वन प्रबंधन की स्मृतियां मेरे वृक्षों के वलयों में आज भी छिपी हैं। स्वतंत्रता के बाद मैंने खेती, पशुपालन और सरल जीवन का दौर देखा है।
यहां के लोगों ने मुझे बाजार की वस्तु नहीं, अपने जीवन का आधार माना। उनकी जरूरतें सीमित थीं, पर संतोष भरपूर। फिर समय बदला। शहर फैला। सड़कें बेहतर हुईं। मेरी ओर बाहरी नजरें उठीं, जिन्होंने मेरे शांत वातावरण और हरियाली में निवेश और बसावट की संभावनाएं जगाईं। यहीं से विकास और संरक्षण के बीच द्वंद्व शुरू हुआ।
आज जब भूमि विवादों के कारण मैं चर्चा में हूं, तो यह भी कहना चाहता हूं कि मेरी असली पहचान बाजार की कीमतों से नहीं, मेरी हरित आभा और पारिस्थितिक संतुलन से है। मेरी असली पहचान भू दस्तावेज नहीं बल्कि मेरे पहाड़, जंगल और जमीन हैं।
मुझे खोजना है तो सुबह की धुंध से संवाद कीजिए। मेरी मिट्टी की गंध में इतिहास की परतें हैं और मेरी हवा में भविष्य की संभावनाएं। विवादों की धूल एक दिन बैठ जाएगी, पर मैं अपनी हरियाली, अपने संतुलन और अपनी खामोश किताब के साथ हमेशा यहीं मौजूद रहूंगा, क्योंकि मैं धौलास हूं। मेरी असली पहचान विवाद नहीं, हरियाली का संसार है।
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