पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलमार्ग के बहाल होने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट का असर अब धीरे-धीरे कम होने लगा है। इससे भारत में भी स्थिति में सुधार और मुश्किलों से थोड़ी राहत की उम्मीद जगी है। सरकार ने एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति पर लगाए गए अधिकांश आपातकालीन प्रतिबंध वापस ले लिए हैं।
इससे पहले वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद वाणिज्यिक गैस सिलेंडर और विमान ईंधन की कीमतों में कटौती की गई थी। इसी बीच, तेल उत्पादक देशों के संगठन ‘ओपेक प्लस’ के कुछ सदस्यों ने अगस्त में अपने तेल उत्पादन में बढ़ोतरी करने का फैसला किया है।

इस कदम से वैश्विक बाजार में अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध होगा, जिससे निश्चित रूप से इसके दामों पर दबाव और कम होगा। मगर सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की आपूर्ति सामान्य होने का लाभ क्या देश के उपभोक्ताओं को तर्कसंगत अनुपात में मिल पाएगा?

सरकार ने देश में ऊर्जा संकट गहराने पर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत एलएनजी की आपूर्ति को लेकर बीते नौ मार्च को आपात व्यवस्था लागू की थी। उस समय अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों और उसके जवाब में ईरानी कार्रवाई के बाद होर्मुज जलमार्ग को बंद कर दिए जाने से तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो गई थी।


सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में युद्धविराम लागू है और शांति वार्ता जारी है, ऐसे में गैस आपूर्ति पर लगाए गए आपात प्रतिबंधों को जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।
दरअसल, देश में उर्जा संकट की आहट के बाद से सरकार की ओर से यह दावा किया जाता रहा कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक उपाय लागू किए जाएंगे, लेकिन जब संकट से सामना करने की बारी आई तो ये विकल्प मुख्य तौर पर तेल एवं गैस की आपूर्ति को सीमित करने और इनकी कीमतें बढ़ाने के रूप में सामने आए।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऊर्जा आपूर्ति के नए स्रोत तलाशने के बजाय संकट का भार सीधे आम आदमी पर डाल देने को ही क्या सरकार का कुशल प्रबंधन माना जाएगा?

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ भारत को आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य तय किए जा रहे हैं, दूसरी ओर देश की कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 फीसद और प्राकृतिक गैस की लगभग आधी आवश्यकता आज भी आयात के जरिए पूरी की जाती है।

इसमें कुल कच्चे तेल आयात का 40-45 फीसद और एलएनजी आयात का करीब 65 फीसद पश्चिम एशिया से आता है। यही वजह है कि होर्मुज जलमार्ग में किसी भी तरह का व्यवधान देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है। यह बात सही है कि ‘ओपेक प्लस’ के सदस्य देशों की ओर से अगस्त में तेल उत्पादन में बढ़ोतरी करने से वैश्विक बाजार की स्थिति काफी हद तक पहले जैसी सामान्य हो जाएगी, लेकिन क्या इसी मुताबिक सरकार तेल की बढ़ी कीमतों में कमी करेगी?

सरकार का तर्क है कि ऊर्जा संकट में तेल कंपनियों को जो नुकसान हुआ था, पहले उसकी भरपाई करना जरूरी है। मगर एक सच यह भी है कि संकट के दौरान पेट्रोल-डीजल और घरेलू रसोई गैस के दामों में जो इजाफा किया गया था, उसका बोझ आज भी आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है।

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