इसी 90 डिग्री के रास्ते पर जाते वक्त युवराज के साथ हुआ हादसा। जागरण
डिजिटल डेस्क, ग्रेटर नोएडा। सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता (27) की मौत ने प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर कर दिया है। हादसे के चार दिन बाद भी न तो नाले में गिरी कार को बाहर निकाला जा सका और न ही उस खतरनाक स्थान पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए।
जिस जगह युवराज की कार गिरी, वहां न दीवार थी, न बैरिकेडिंग और न ही कोई चेतावनी बोर्ड। सवाल यह है कि हाईटेक सिटी कहे जाने वाले इलाके में इतनी बुनियादी चूक कैसे हो गई?
परिजनों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा इंतजाम किए जाते और तत्काल रेस्क्यू होता, तो आज युवराज जिंदा होता। हादसे के बाद कई अधिकारी मौके पर पहुंचे, लेकिन जिम्मेदारी तय करने के बजाय केवल औपचारिकताएं निभाई गईं।
युवराज के पिता राजकुमार मेहता का आरोप है कि उनका बेटा करीब दो घंटे तक पानी में संघर्ष करता रहा और मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन मौके पर मौजूद लोग तमाशबीन बने रहे। कुछ लोग वीडियो बनाते रहे, जबकि प्रशासन के पास गोताखोर तक उपलब्ध नहीं थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार युवराज की मौत का कारण डूबने से दम घुटना और उसके बाद कार्डियक अरेस्ट बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि युवराज के फेफड़ों में करीब 200 मिलीलीटर पानी भरा हुआ था। डॉक्टरों के मुताबिक पानी भरने के कारण उसे सांस लेने में दिक्कत हुई और हालत बिगड़ती चली गई।
रेस्क्यू में देरी और असहाय सिस्टम
परिजनों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर तो पहुंचे, लेकिन रेस्क्यू में भारी देरी हुई। जरूरी संसाधन समय पर नहीं पहुंचे। बाद में SDRF और NDRF की टीमों ने सर्च ऑपरेशन चलाया, तब जाकर युवराज का शव बरामद हुआ।
कर्मी बोले— “सरिये घुस जाएंगे, फिर भी मैं कूदा”
इस बीच युवराज को बचाने के लिए पानी में उतरने वाले डिलिवरी बॉय मुकेश का बयान भी सिस्टम की कमजोरी उजागर करता है। मुकेश के मुताबिक युवराज करीब दो घंटे तक मोबाइल की टॉर्च जलाकर खुद को बचाने की कोशिश करता रहा।
मुकेश ने बताया कि सरकारी कर्मियों ने यह कहकर नाले में उतरने से इनकार कर दिया कि नीचे सरिये हैं। अगर उसमें कूदते तो सरिये शरीर में घुस सकते थे। मुकेश फिर भी युवराज को बचाने के लिए कूद गया और बिना किसी सुरक्षा रस्सी के करीब 30–40 मिनट तक बचाने का प्रयास करता रहा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
टूटे सपने और अधूरी रह गई जिंदगी
दोस्तों के साथ युवराज जयपुर ट्रिप की तैयारी कर रहा था, जो अब हमेशा के लिए अधूरी रह गई। परिवार के अनुसार, वह शादी के बाद अलग शिफ्ट होने और बेहतर भविष्य की योजनाएं बना रहा था। सिस्टम की लापरवाही ने एक हंसता-खेलता परिवार उजाड़ दिया।
इन सवालों का कौन देगा जवाब?
- पौने दो घंटे में भी युवराज को क्यों नहीं बचाया जा सका?
- NDRF को देरी से जानकारी क्यों मिली?
- क्या कुछ अफसरों पर कार्रवाई से भविष्य की सुरक्षा की गारंटी मिल जाएगी?
- सीनियर अफसर मौके पर क्यों नहीं पहुंचे?
- आगे ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए अब तक क्या ठोस योजना बनी?
- बुनियादी सुरक्षा इंतजाम कब होंगे, ताकि गड्ढे और खुले नाले किसी की जान न लें?
- अगर हाईटेक सिटी में ही सिस्टम फेल है, तो बाकी इलाकों में जनता किस पर भरोसा करें?
हादसे की हैं कई वजह
1) पानी से भरा गड्ढा, लेकिन सुरक्षा नहीं
बारिश का पानी खुदाई किए गए गड्ढे में जमा होता रहा और किसी ने ध्यान नहीं दिया। यह गड्ढा बिना बाड़, बिना चेतावनी और बिना ड्रेनेज मॉनिटरिंग के खुला छोड़ दिया गया, जिससे यह एक खतरनाक जलाशय बन गया।
सार्वजनिक सड़क के पास होने के बावजूद इस गंभीर खतरे को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। सिंचाई विभाग और नोएडा अथॉरिटी का कहना है कि रेनवॉटर रेगुलेटर लगाने में देरी की वजह से यहां पानी भर गया।
2) 90 डिग्री का खतरनाक मोड़ और फेंसिंग भी नहीं
हादसे वाली जगह पर करीब 90 डिग्री का तीखा मोड़ था। इस मोड़ पर कमजोर फेंसिंग थी, जिसे कोई भी वाहन आसानी से तोड़ सकता था। क्रैश बैरियर या कोई चेतावनी नहीं थी। घना कोहरा और खराब विजिबिलिटी थी, इसके साथ ही पर्याप्त लाइटिंग का अभाव था।
इन सब कारणों ने मिलकर इस सड़क को जानलेवा बना दिया। नोएडा ट्रैफिक पुलिस का इस मामले में कहना है कि इस जगह को लेकर कभी कोई शिकायत नहीं मिली और न ही बैरिकेडिंग या साइनज की मांग सामने आई।
3) रेस्क्यू में हुई देरी जानलेवा साबित हुई
करीब 90 मिनट का रेस्क्यू विंडो होने के बावजूद पुलिस, फायर सर्विस, SDRF और NDRF युवराज को बचा नहीं सकीं। उनके पास जरूरी उपकरण, ट्रेनिंग और आपसी समन्वय तक नहीं था। रस्सियां छोटी थीं, क्रेन नहीं पहुंच सकी और अधिकारी पानी में उतरकर रेस्क्यू करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे। रेस्क्यू में हुई यह देरी जानलेवा साबित हुई।
चार पॉइंट में समझें कैसे हुआ हादसा
- आधी रात में घने कोहरे से गुजरते हुए कार एक 90 डिग्री के मोड़ की ओर बढ़ी, जहां बैरिकेडिंग नहीं थी।
- SUV सड़क के कमजोर किनारे को तोड़ते हुए 40–50 फीट गहरे बारिश के पानी से भरे गड्ढे में गिर गई।
- युवराज मेहता कार की छत पर चढ़ गए और करीब 90 मिनट तक मदद का इंतजार किया।
- अपर्याप्त ट्रेनिंग और संसाधनों की कमी के कारण रेस्क्यू टीम उन्हें बचा नहीं सकी।
कब और क्या हुआ
- 12:00 बजे: अनियंत्रित कार समेत युवराज मेहता पानी में गिरे।
- 12:20 बजे: युवराज ने मोबाइल फोन से अपने पिता को हादसे की सूचना दी।
- 12:20 बजे: पिता ने तुरंत डायल 112 पर घटना की जानकारी दर्ज कराई।
- 12:25 बजे: पुलिस कंट्रोल रूम से प्रभारी निरीक्षक के पास कॉल गई।
- 12:41 बजे: पुलिस फोर्स और दमकल विभाग के कर्मी घटनास्थल पर पहुंचे।
- 12:50 बजे: एसडीआरएफ (SDRF) की टीम घटनास्थल पर पहुंची।
- 01:15 बजे: बेसमेंट में भरे पानी में कार समेत युवराज पूरी तरह डूब गए।
- 01:45 बजे: गाजियाबाद से पहुंची एनडीआरएफ (NDRF) टीम ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया।
- 01:55 बजे: युवराज को पानी से बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया।
- सुबह 4:00 बजे: इलाज के दौरान युवराज की मौत हो गई।
युवराज की मौत अब केवल एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की सामूहिक विफलता बन चुकी है। सवाल यह है कि क्या इस मौत के बाद भी व्यवस्था यूं ही सोई रहेगी, या कोई जवाबदेही तय होगी?
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