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Darbhanga Raj Railway: जब अकाल में जनता के लिए बिछी थी शाही रेल, तिरहुत रेलवे ने रचा इतिहास

deltin33 3 hour(s) ago views 775
  

Darbhanga Royal Train:17 अप्रैल 1874 को दरभंगा और समस्‍तीपुर के बीच तिरहुत रेलवे की पहली ट्रेन चली थी। नरगौना स्थित रेलवे स्‍टेशन पर लगा रहता था शाही सैलून पैलेस आन व्‍हील। इसकी जानकारी आज भारतीय रेलवे के पास भी नहीं है। सभी फोटो सौ: महाराजा कामेश्‍वर सिंह फाउंडेशन






अजित कुमार, दरभंगा।Tirhut Railway History: उत्तर बिहार के इतिहास में दरभंगा राज का नाम अक्सर वैभव, दानशीलता और सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में लिया जाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि यही रियासत भारतीय रेल के इतिहास में भी एक संवेदनशील, दूरदर्शी और जनहितकारी प्रयोग की मिसाल रही है।

  

दरभंगा राज ने रेल को कभी शाही विलासिता का साधन नहीं माना, बल्कि विकास और लोककल्याण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। देश की चुनिंदा रियासतों में शामिल दरभंगा राज की अपनी निजी रेलवे व्यवस्था यानी तिरहुत रेलवे न केवल तकनीकी दृष्टि से उन्नत थी, बल्कि सामाजिक सोच में भी अपने समय से बहुत आगे थी।

  

थर्ड क्लास के डिब्बों में शौचालय की व्यवस्था से उस समय की यात्री सुविधा के स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है।
अकाल से उपजी रेल, जो बन गई इतिहास

पुरातात्विक इतिहासकार तेजकर झा ने बताया कि वर्ष 1873–74 में उत्तर बिहार भयंकर अकाल की चपेट में था। भूख से तड़पते लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए कोई तेज़ साधन नहीं था। ऐसे संकट के समय महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने रेल चलाने का निर्णय लिया, जो उन्हें इतिहास में अमर कर गया।

  

मात्र 62 दिनों में बाजितपुर (बरौनी के निकट) से दरभंगा तक 55 मील लंबी रेल लाइन बिछवा दी गई। यह उस दौर में विश्व रिकॉर्ड माना गया। 17 अप्रैल 1874 को जब पहली ट्रेन दरभंगा पहुंची तो वह किसी महाराजा की सवारी नहीं थी। वह अनाज से लदी मालगाड़ी थी। यह साफ संदेश दे रही थी कि दरभंगा राज के लिए जनता पहले थी, वैभव बाद में।
तीन स्टेशन, तीन वर्ग

उस समय दरभंगा शायद देश का इकलौता शहर था, जहां सामाजिक संरचना के अनुसार रेलवे स्टेशन बनाए गए थे:-

  • हराही स्टेशन (वर्तमान दरभंगा जंक्शन): आम जनता के लिए
  • लहेरियासराय स्टेशन: ब्रिटिश अधिकारियों व प्रशासनिक कार्यों के लिए
  • नरगौना टर्मिनल: महाराजा का निजी स्टेशन, जो सीधे नरगौना (छत्र निवास) पैलेस के परिसर में स्थित था


  

नरगौना टर्मिनल देश का इकलौता ऐसा महलनुमा स्टेशन था, जहां सीधे महल के भीतर तक ट्रेन प्रवेश करती थी। यहां केवल महाराजा की निजी ट्रेनें और विशिष्ट अतिथियों के शाही सैलून रुकते थे।

  
‘पैलेस ऑन व्हील्स’: चलता-फिरता राजमहल

महाराजा की निजी शाही ट्रेन को उस दौर में ही ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ कहा जाने लगा था। इन सैलूनों में सोने-चांदी की नक्काशी, मखमली फर्नीचर, शयनकक्ष, रसोई और उस समय की आधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं।

  

1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद मिथिला यात्रा पर आए महात्मा गांधी ने इसी शाही ट्रेन का उपयोग किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रिटिश वायसराय और कई विदेशी अतिथि भी इस चलती-फिरती शाही दुनिया के साक्षी बने।

यात्री सुविधा में भी सबसे आगे

भारतीय रेल इतिहास में तिरहुत रेलवे दो कारणों से विशेष रूप से उल्लेखित है:-

  • पहला, 1874 से 1934 के बीच देश में सबसे अधिक रेल पटरी तिरहुत रेलवे ने ही बिछाई।
  • दूसरा, सामान्य (थर्ड क्लास) डिब्बों में शौचालय की सुविधा सबसे पहले तिरहुत रेलवे ने शुरू की।


यह उस दौर में एक क्रांतिकारी सोच थी, जब आम यात्रियों की सुविधाओं पर शायद ही कोई ध्यान देता था।
नदी, स्टीमर और तकनीकी कौशल

गंगा नदी पार करने के लिए तिरहुत रेलवे के पास अपने चार विशाल स्टीमर थे — Eagle, Fence, Flox और Silph।
ये सुल्तानपुर घाट से मोकामा–सिमरिया घाट के बीच रेल वैगनों को ढोते थे। यह व्यवस्था उस समय के इंजीनियरिंग कौशल और प्रबंधन क्षमता की अद्भुत मिसाल थी।

तेजकर झा ने बताया कि तिरहुत रेलवे के विकास में अंग्रेजों का सहयोग जरूर रहा, लेकिन इसके लिए आवश्यक इंजीनियरिंग और प्रशिक्षण के लिए राज परिवार की ओर से दरभंगा में ही टेक्निकल इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई थी। यह आजादी के बाद करीब 1970 के दशक तक प्रशिक्षण संस्थान के रूप में काम करता रहा।

  
भूकंप, विरासत और उपेक्षा

1934 के भूकंप ने तिरहुत रेलवे की रीढ़ तोड़ दी। कई पटरियां क्षतिग्रस्त हो गईं, जो आज भी वैसी ही पड़ी हैं। पूर्णिया प्रमंडल का दरभंगा से रेलवे संपर्क 1880 के आसपास जुड़ गया था, लेकिन 1934 के बाद वह आज तक बहाल नहीं हो पाया।1943 में तिरहुत रेलवे का विलय अवध–तिरहुत रेलवे में हुआ। जो आगे चलकर भारतीय रेलवे का हिस्सा बना।

  
खोती हुईं धरोहरें

नरगौना टर्मिनल और ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ जैसी विरासतों को सहेजने का अवसर हाथ से निकलता चला गया।1975 में बरौनी में रखे गए शाही सैलून को आग के हवाले कर दिया गया। कहा जाता है कि इससे पहले उसके कीमती सामान लूट लिए गए।

  

नरगौना पैलेस परिसर स्थित स्टेशन को भी धीरे-धीरे नष्ट किया गया। 2017 में वह ऐतिहासिक द्वार तोड़ दिया गया, जहां से ट्रेन महल के भीतर प्रवेश करती थी।आज केवल एक संरक्षण बोर्ड और कुछ अवशेष ही उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं।

दरभंगा राज की रेलवे व्यवस्था यह सिखाती है कि संसाधनों का सही उपयोग जब जनहित में होता है, तो वह केवल सुविधा नहीं, बल्कि इतिहास बन जाता है।यह कहानी बताती है कि विकास का अर्थ केवल इमारतें और वैभव नहीं, बल्कि संकट के समय मानवता के साथ खड़ा होना भी है।
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