अभ्यास करतीं लड़कियां। सौ. प्रशिक्षक
प्रभात मिश्र, नरकटियागंज (पश्चिम चंपारण) । बिहार के पश्चिम चंपारण जिले की बेटियां आज राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहीं हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सीमित संसाधनों के बीच इन बेटियों ने न सिर्फ अपनी प्रतिभा साबित की है, बल्कि अपने क्षेत्र और देश को भी गौरवांवित कर रही हैं।
नरकटियागंज में करीब एक दर्जन लड़कियां राष्ट्रीय स्तर पर फुटबाल खेल रही हैं। ये सभी ग्रामीण क्षेत्र की रहने वाली हैं। छह से आठ किलोमीटर दूर नोनिया टोला और डीके शिकारपुर, बनवरिया आदि गांवों से सुबह 7:30 बजे नरकटियागंज उच्च विद्यालय खेल मैदान में अभ्यास के लिए पहुंचती हैं। वहां दो घंटे अभ्यास करती हैं।
आठवीं की छात्रा प्रिया कुमारी अंडर-14 और मुस्कान कुमारी अंडर-16 खिलाड़ी हैं, जबकि निक्की, सपना, रिया और जानकी कुमारी राष्ट्रीय स्तर पर अंडर-17 खिलाड़ी हैं। खेल कोटे से 35 से अधिक लड़कियों को नौकरी मिल चुकी है।
फुटबाल और कैरम जैसे खेलों में राज्य, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करने के साथ ही खिलाड़ी खेल कोटे से सरकारी नौकरी पाकर आत्मनिर्भर भी बन रही हैं। संसाधनों की कमी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद इन बेटियों ने यह साबित कर दिया कि मेहनत और लक्ष्य के आगे कोई बाधा बड़ी नहीं होती।
पुलिस, अर्धसैनिक बल, रेलवे व सचिवालय में खेल कोटे से पाई नौकरी
नरकटियागंज की वाजिदा तबस्सुम जिले की पहली महिला फुटबालर हैं, जिन्होंने वर्ष 1992 में स्कूल स्तर से फुटबाल खेलना शुरू किया। आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिहार का प्रतिनिधित्व किया।
खेल कोटे से नौकरी मिलने के बाद उनके संघर्ष की कहानी अन्य लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई। चनपटिया की नेहा ने कैरम के दम पर नौकरी हासिल की।
बीते डेढ़ दशक में जिले की करीब 35 महिला खिलाड़ियों ने फुटबाल में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। इनमें से कई शिक्षा विभाग, बिहार पुलिस, अर्धसैनिक बल, रेलवे और राज्य सचिवालय में सेवा दे रही हैं।
वंदना कुमारी, रितुल कुमारी, रितिका कुमारी और मनीषा बिहार पुलिस में कार्यरत हैं। अंशा, रजनी, ज्योति और शशि रेलवे में नौकरी कर रही हैं, जबकि लकी और अनीशा को खेल कोटे से राज्य सचिवालय में स्थान मिला है।
ज्यादातर लड़कियां गरीब परिवार की
खेल प्रशिक्षक सुनील वर्मा ने बताया कि वर्तमान में करीब 40 लड़कियां फुटबाल का प्रशिक्षण ले रही हैं। फुटबाल के प्रति लड़कियों का काफी लगाव रहा है। दीप रानी पासवान व मुस्कान प्रिया गरीबी परिवार से होने के बावजूद अपनी मेहनत के बल पर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची हैं।
अधिकांश खिलाड़ी सामान्य और गरीब परिवारों से आती हैं। राष्ट्रीय खिलाड़ी नमिता बैठा के पिता कपड़ा धोने का काम करते हैं, जबकि प्रिया कुमारी के पिता मजदूर हैं।
खेल शिक्षिका निर्मला और दिव्या का कहना है कि लक्ष्य तय कर निरंतर मेहनत की जाए तो अवसर खुद रास्ता बना लेते हैं। मधु, अंजुम आरा, श्वेता, अंतिमा, आभा, गीता, शोभा, आरती और किरण खेल के दम पर नौकरी कर रही हैं। |