नई दिल्ली। भारत ने कच्चे तेल की खरीद को लेकर अपनी रणनीति में साफ बदलाव किया है। अब देश ज्यादा भरोसेमंद और कम जोखिम वाले स्त्रोतों से तेल लेने पर जोर दे रहा है। इसी वजह से मध्य-पूर्व के देशों से तेल आयात बढ़ा है, जबकि रूस से तेल की खरीद जारी तो है, लेकिन पहले के मुकाबले सीमित और सावधानी के साथ हो रही है। फिलहाल भारत की रणनीति स्पष्ट है, जहां भरोसेमंद और सुचारू आपूर्ति मिले, वहां से तेल लिया जाए, और साथ ही सस्ते विकल्पों को भी पूरी तरह छोड़ा न जाए।
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन इसी कच्चे तेल से बनते हैं। ऐसे में तेल की लगातार और सुरक्षित आपूर्ति भारत के लिए बेहद जरूरी है।
रियल-टाइम डेटा कंपनी केप्लर के मुताबिक, जनवरी 2026 के पहले तीन हफ्तों में रूस से कच्चे तेल का आयात घटकर करीब 11 लाख बैरल प्रति दिन रह गया है। इससे पहले दिसंबर में यह औसतन 12.1 लाख बैरल था, जबकि 2025 के मध्य में यह आंकड़ा 20 लाख बैरल प्रतिदिन से भी ज्यादा पहुंच गया था। दूसरी ओर, इराक और सऊदी अरब से तेल आपूर्ति में साफ बढ़ोतरी हुई है। इराक अब लगभग रूस के बराबर तेल भारत को दे रहा है, जबकि सऊदी अरब से आयात भी तेजी से बढ़ा है।
इससे साफ है कि भारत एक बार फिर अपने पारंपरिक मध्य-पूर्वी साझेदारों पर ज्यादा भरोसा कर रहा है। दरअसल, अमेरिका (Trump Tariff) द्वारा रूस की तेल कंपनियों पर लगाए गए नए प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल की खरीद में जोखिम बढ़ गया है। जहाजरानी, बीमा, भुगतान और कानूनी जांच जैसी परेशानियों के चलते भारतीय रिफाइनरियों ने कुछ समय के लिए रूसी तेल लेना कम कर दिया था।
केप्लर के विशेषज्ञ सुमित रितोलिया के मुताबिक, यह बदलाव स्थायी नहीं बल्कि अस्थायी संतुलन है। रूस का तेल अब भी सस्ता है और रिफाइनरियों के मुनाफे के लिए फायदेमंद बना हुआ है। जहां नियमों का पालन संभव है, वहां भारतीय कंपनियां रूसी तेल की खरीद जारी रखेंगी। रूसी तेल पर पांच डालर प्रति बैरल तक की छूट आइओसी और बीपीसीएल जैसी भारतीय रिफाइनरियां प्रतिबंधों से मुक्त रूसी कंपनियों से कच्चा तेल खरीद रही हैं।
संकेत मिल रहे हैं कि रिलायंस भी जल्द ही ऐसी गैर-प्रतिबंधित कंपनियों से तेल की खरीद दोबारा शुरू कर सकती है। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि रूसी कच्चा तेल कीमत के लिहाज से अब भी आकर्षक बना हुआ है। रूसी ग्रेड का तेल फिलहाल चौथी तिमाही की शुरुआत की तुलना में कहीं ज्यादा छूट पर कारोबार कर रहा है। भारत को ये ओमान/दुबई ग्रेड के मुकाबले लगभग 5-7 डालर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है, जबकि नवंबर के अंत से पहले यह अंतर करीब 2-4 डालर प्रति बैरल था। इसका मतलब है कि रूस का तेल अब अपने पहले के स्तर की तुलना में लगभग 4-5 डालर प्रति बैरल और सस्ता हो गया है।
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