मनोज कुमार शर्मा, धर्मशाला। हिमाचल के बिलासपुर जिले के बरठीं के छोटे से गांव कंडयाना के विज्ञानी डा. प्रेम लाल गौतम के नाम के साथ अब पद्मश्री जुड़ गया है। इनकी उपलब्धियों की सूची इतनी लंबी है कि किताब भी कम पड़ जाए।
पद्मश्री की घोषणा होने के बाद भी विनम्रता इतनी है कि इसे किसानों को समर्पित करते हैं। गेहूं, फाक्सटेल बाजरा, सोयाबीन, राइस बीन, अमरंथ और बकव्हीट की 12 उन्नत फसल किस्मों के विकास में कृषि विज्ञानी डा. गौतम का अतुलनीय योगदान रहा है।
जैविक विविधता एवं पादप किस्मों के संरक्षण एवं किसान अधिकार अधिनियमों के लागू होने से पहले और बाद में कृषि जैव विविधता संवादों पर राष्ट्रीय नीति कार्य योजना में योगदान दिया।
उन्होंने आनुवंशिकी और पादप प्रजनन में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पढ़ाए हैं और कई छात्रों का एमएससी और पीएचडी के शोध कार्य में मार्गदर्शन किया है।
वर्तमान में पालमपुर में रह रहे डा. गौतम बताते हैं कि ग्लोबल क्राप डायवर्सिटी ट्रस्ट में चार साल तक सदस्य रहने के दौरान किसानों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए अहम भूमिका निभाई। 2014-2019 तक वह ट्रस्ट के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य रहे।
160 देशों वाली इस संस्था में देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला तो किसानों की बात प्रमुखता से रखी। दुनिया भर में फसल की विविधता को संरक्षित करने वाले जीन बैंकों को सुरक्षित रखने के लिए प्रमुख भूमिका निभाने वाले ट्रस्ट का मुख्यालय जर्मनी में है।
किसानों को उनके अधिकारों दिलाने पर काम करने वाले पीएल गौतम करीब 24 देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भारतीय हरित क्रांति के जनक रहे एमएस स्वामीनाथन के शिष्य रहे प्रोफेसर गौतम कहते हैं कि उनके जैसा गुरु जिंदगी में कहां मिलता है।
साइंस और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उन्हें यह सम्मान देने की सूचना सुबह करीब दस बजे गृह मंत्रालय ने दी। उस समय डाक्टर गौतम पालमपुर की हाउसिंग बोर्ड कालोनी बिंद्राबन स्थित आवास में ही थे।
पंतनगर से की करियर की शुरुआत
बरठीं के स्कूल के हायर सेकेंडरी करने के बाद डाक्टर गौतम सोलन के नौणी से बीएससी एग्रीकल्चर करने के बाद दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) से एमएससी की पढ़ाई की। उसके बाद यहीं पीएचडी भी की। 12 दिसंबर 1947 को जन्मे डा. गौतम ने 1974 में पहली बार जीबी पंत विश्वविद्यालय पंतनगर में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं शुरू कीं। यहीं पर 2003 में कुलपति बने।
कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने पर उन्हें गढ़वाल स्थित हिल कैंपस का जिम्मा सौंपा गया। सोलन के नौणी स्थित विवि में डीन के रूप में भी सेवाएं दीं। विभिन्न स्थानों में सेवाएं दी। दो साल तक कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में बतौर अध्यक्ष सेवाएं देने के बाद 2012 में सेवानिवृत हुए।
वर्तमान में बिहार के समस्तीपुर स्थित डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के कुलाधिपति के पद पर तैनात डाक्टर गौतम ने कई शोधार्थियों को पीएचडी करवाने में अहम भूमिका निभाई है।
हिमाचल के हमीरपुर स्थित करियर प्वाइंट विश्वविद्यालय के शुरू होने के दौरान कुलपति का दायित्व संभाला और वर्तमान में यहां प्रो-वीसी भी हैं। बरठीं के निहारी में स्कूल के चेयरमैन भी हैं।
माता-पिता और भाई के योगदान को सराहा
कृषक पिता खजाना राम और माता गुलाबी देवी ने पांच बच्चों को गरीबी के बावजूद पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। बड़े भाई केडी गौतम का योगदान भी परिवार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण मानते हैं। दिवंगत छोटे भाई प्रभदयाल को भी इस अवसर पर याद करते हुए भावुक हो गए।
हरिमन के सेब को दिलाई पहचान
पिछले साल बिलासपुर के किसान हरिमन शर्मा को निचले क्षेत्रों में सेब की किस्म विकसित करने के लिए पद्मश्री मिला है। हरिमन-99 के नाम से इस वैरायटी को पंजीकृत करवाने में डाक्टर गौतम ने अहम भूमिका निभाई है।
डाक्टर गौतम कहते हैं कि किसी भी किस्म को आमतौर पर किसी विज्ञानी के नाम से ही पंजीकृत किया जाता है, लेकिन हरिमन के सेब को उनके नाम से पंजीकृत करवाया गया है।
प्रशासनिक एवं शैक्षणिक नेतृत्व
अपने दीर्घ वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक करियर के दौरान डॉ. गौतम ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) में उप महानिदेशक, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के निदेशक, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति तथा पादप प्रजाति संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है।
प्रमुख पुरस्कार
- डा. हरभजन सिंह स्मृति पुरस्कार
- लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल पुरस्कार
- इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी पुरस्कार और अन्य पुरस्कार
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