search
 Forgot password?
 Register now
search

Padma Awards 2026 : खेत से राष्ट्रपति भवन तक, गोपालजी त्रिवेदी की मिट्टी से निकली पद्मश्री कहानी

cy520520 5 hour(s) ago views 1075
  

गोपालजी त्रिवेदी  



राधा कृष्ण, पटना। Padma Awards 2026 की सूची में जब बिहार के गोपालजी त्रिवेदी का नाम पद्मश्री के लिए सामने आया, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि बिहार की खेती, किसान और वैज्ञानिक सोच की जीत थी। लीची के बागानों से लेकर जलजमाव वाले तालाबों में मखाना की खेती तक, डॉ. त्रिवेदी ने बिहार की कृषि को नई पहचान दी।
लीची के बूढ़े बागानों में नई जान

डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को लीची की खेती में ‘क्रांतिकारी वैज्ञानिक’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने पुराने और अनुपयोगी होते जा रहे लीची बागानों को Rejuvenation Canopy Management तकनीक से फिर से उपजाऊ बना दिया। इस तकनीक ने हजारों किसानों की आमदनी बढ़ाई और मुजफ्फरपुर की लीची को वैश्विक पहचान दिलाई।
जहां पानी अभिशाप था, वहां मखाना बना वरदान

उत्तर बिहार के जलजमाव वाले इलाके वर्षों तक किसानों के लिए परेशानी बने रहे। डॉ. त्रिवेदी ने इसी समस्या को अवसर में बदला। उन्होंने मखाना और सिंघाड़े की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया। आज यही मखाना बिहार की पहचान और किसानों की आय का बड़ा स्रोत बन चुका है।
आस्था से जुड़ा रहा वैज्ञानिक का जीवन

पद्मश्री सम्मानित डॉ. गोपालजी त्रिवेदी विज्ञान और आधुनिक कृषि के साथ-साथ गहरी आस्था के लिए भी जाने जाते हैं। बताया जाता है कि वे अपने पैतृक गांव मतलुपुर स्थित मृदलुपुर शिव मंदिर में हर महीने विधिवत रुद्राभिषेक कराते थे। रुद्राभिषेक में अपने पेड़ के ही बेलपत्र से पूजा करते है।

उच्च पदों पर रहने के बावजूद उनका जुड़ाव अपनी मिट्टी और परंपराओं से कभी नहीं टूटा। ग्रामीणों के अनुसार, खेती के नए प्रयोग शुरू करने से पहले वे शिव आराधना को शुभ मानते थे। आस्था और कर्म के इस संतुलन ने ही उनके जीवन को विशिष्ट पहचान दी।   
मक्का से बदली बिहार की खेती की तस्वीर

शीतकालीन मक्का (Winter Maize) की खेती को बढ़ावा देने में डॉ. त्रिवेदी की भूमिका ऐतिहासिक रही। उनके मार्गदर्शन में बिहार मक्का उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हुआ। यह बदलाव केवल फसल का नहीं, बल्कि खेती की सोच का था।
हल थामने वाला छात्र बना कृषि विश्वविद्यालय का कुलपति

मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड के मतलुपुर गांव में जन्मे गोपालजी त्रिवेदी की कहानी संघर्ष से लिखी गई है। पिता के निधन के बाद पढ़ाई छोड़कर खेत संभालने वाले इस युवक ने मां की प्रेरणा और अपनी मेधा के बल पर कृषि विज्ञान में पीएचडी की और आगे चलकर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
पोस्टकार्ड पर लिखा आवेदन और बदली किस्मत

स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी ने गोपालजी की प्रतिभा को पहचाना। उनके कहने पर डॉ. त्रिवेदी ने एक साधारण पोस्टकार्ड पर कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए आवेदन किया। यही पोस्टकार्ड उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।
जेपी ने सौंपी थी किसानों की जिम्मेदारी

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जब मुशहरी क्षेत्र में किसानों की बदहाली देखी, तो समाधान की जिम्मेदारी डॉ. त्रिवेदी को सौंपी। जेपी मानते थे कि सामाजिक समस्याओं का समाधान खेतों से होकर गुजरता है, और डॉ. त्रिवेदी इस सोच के सबसे मजबूत स्तंभ बने।
सम्मानों से ज्यादा मिट्टी से जुड़ाव

प्रोफेसर से कुलपति और राष्ट्रीय समितियों के सदस्य बनने के बावजूद डॉ. त्रिवेदी का रिश्ता खेतों से कभी नहीं टूटा। रिटायरमेंट के बाद भी वे किसानों को नई तकनीक सिखाने में जुटे हैं। कहा जाता है कि वे आज भी हर महीने अपने गांव मतलुपुर के शिव मंदिर में रुद्राभिषेक कराते हैं।
पद्मश्री नहीं, बिहार की कृषि आत्मा का सम्मान

Padma Awards 2026 में मिला पद्मश्री सम्मान डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की व्यक्तिगत उपलब्धि भर नहीं है। यह बिहार की कृषि क्षमता, वैज्ञानिक सोच और उस किसान नेतृत्व का सम्मान है, जिसने मिट्टी से जुड़कर राष्ट्र को मजबूत किया।
like (0)
cy520520Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments
cy520520

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1510K

Credits

Forum Veteran

Credits
153536

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com