15 मई, 2026 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अबू धाबी पहुंचे, तो हवाई अड्डे पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति महामहिम शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान ने उनका स्वागत किया. खाड़ी में पसरे तनाव के बीच प्रधानमंत्री UAE पहुंचे थे. फुजैराह तेल क्षेत्र में ड्रोन दागे गए थे, जिसमें तीन भारतीय घायल हुए थे, तो होर्मुज़ के दक्षिण में भारतीय झंडे लगे जहाज़ को संदिग्ध ड्रोन से डुबो दिया गया था. UAE के बाराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर भी हमले हुए थे.
भारत और UAE के रिश्ते कितने मज़बूत हैं, इसका पता एक-दूसरे देश में राजनयिक दौरों से खुद-ब-खुद साफ़ हो जाता है. UAE के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद जनवरी, 2026 में भारत आए, जिसके बाद फ़रवरी में क्राउन प्रिंस शेख़ खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद ने भारत का दौरा किया. प्रधानमंत्री की यात्रा से कुछ ही दिन पहले भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी अबू धाबी गए थे. जब भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही हो, आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हों और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार लगातार अस्थिर बना हुआ हो, तब नई दिल्ली यही चाहेगी कि UAE जैसे साझेदारों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाकर वह अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षा और लंबे समय तक ऊर्जा सुरक्षा, दोनों सुनिश्चित कर ले.
UAE पहले से ही भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है. दोनों देशों के बीच संबंधों की एक मज़बूत कड़ी ऊर्जा है. ऐसे में, सवाल यह भी था कि वे कितने प्रभावी ढंग से अपने स्थायी व्यापारिक संबंधों को मज़बूत ऊर्जा साझेदारी में बदल पाते हैं?
ऊर्जा क्षेत्र के कई समझौते बताते हैं कि मौजूदा संकट से काफ़ी पहले ही रिश्तों को व्यवस्थित कर लिया गया था और अब इस मज़बूत संबंध को रणनीतिक स्तर पर ले जाने की उम्मीद की जा रही है.
इस लिहाज़ से सबसे महत्वपूर्ण है, कच्चे तेल का भंडारण. 2018 के एक समझौते के बाद से UAE भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) कार्यक्रम में भाग लेने वाला एकमात्र विदेशी देश रहा है. इस व्यवस्था के मुताबिक, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) ने मंगलुरु स्थित इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) के भंडार में कच्चे तेल के भंडारण के लिए 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है. यहां कंपनी 5.86 मिलियन बैरल सामरिक कच्चे तेल का भंडार रखती है. भारत ने 2020 में ADNOC को भारतीय भंडारों में रखे कच्चे तेल का ‘री-एक्सपोर्ट’, यानी फिर से निर्यात करने का अधिकार दिया, जो कारोबार के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण सुविधा है. इसके साथ ही, ONGC की अधीनता वाले भारतीय कंसोर्टियम के पास ADNOC के लोअर जाकुम फील्ड में 40 साल की अपस्ट्रीम हिस्सेदारी है. इसके ज़रिये उसे कच्चे तेल के उत्पादन में अनुपात के हिसाब से हिस्सा मिलता है.
मई 2026 की यात्रा से यह ऊर्जा ढांचा न सिर्फ़ बेहतर बना, बल्कि इसे औपचारिक रूप भी मिला. ISPRL और ADNOC के बीच एक नए रणनीतिक सहयोग समझौते के तहत भारत के SPR में UAE की हिस्सेदारी को लगभग पांच गुना बढ़ाते हुए 30 मिलियन बैरल करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके साथ ही भारत में रणनीतिक गैस भंडारों को भी साझेदारी में विकसित करने की योजना बनाई गई है.
भारत के तेल भंडारों में जमा कच्चा तेल ADNOC का है, भारत का नहीं. साथ ही, री-एक्सपोर्ट संबंधी प्रावधानों के कारण ADNOC इसका एक हिस्सा व्यावसायिक रूप से बेच भी सकता है. हालांकि, 2018 के मूल समझौते के अनुसार, आपूर्ति में रुकावट आने जैसी आपात स्थिति में भारत भी इस कच्चे तेल का इस्तेमाल कर सकता है. इसलिए आपात स्थितियों में पहुंच को प्राथमिकता देने और ‘पहले मना करने के अधिकार’ को नियंत्रित करने वाले प्रावधान ISPRL-ADNOC समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू है. इस पर विशेष काम करने की ज़रूरत होगी, क्योंकि यह साझेदारी 30 मिलियन बैरल तक बढ़ने और फुजैराह स्थित भंडारण सुविधाओं तक भारत की पहुंच बनने की भी संभावना है.

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यानी, मौका तो खूब है, लेकिन इसका पूरा लाभ हम तभी उठा सकेंगे, जब घरेलू स्तर पर निर्माण किया जाए. भारत की मौजूदा SPR क्षमता केवल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है. अगर इसे बैरल में बांट दें, तो विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर की तीनों भूमिगत गुफाओं में लगभग 39 मिलियन बैरल तेल है, जबकि हमारा भंडार केवल 24-25 मिलियन बैरल ही है. ऐसे में, 30 मिलियन बैरल तक साझेदारी बढ़ने के बाद भी IEA की अनुशंसा (90 दिन कवरेज बेंचमार्क) से भारत काफ़ी पीछे रहेगा.
इसके दूसरे चरण के विस्तार को 2021 में मंजूरी मिली थी, जिसमें 14,500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की योजना है. हालांकि, इसके तहत विकास-कार्य अभी चल ही रहे हैं, इसलिए ADNOC की भागीदारी बढ़ाने वाला समझौता तभी मायने रखेगा, जब भारत पादुर जैसी कैवर्न क्षमता को चालू करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाए.
फुजैराह गलियारा इस उभरते ढांचे की भौगोलिक बुनियाद है. फुजैराह में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बंकरिंग सुविधा है और यह होर्मुज़ जलमार्ग के बाहर ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित है. इतना ही नहीं, अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन पहले से ही UAE के कच्चे तेल को 1.8 मिलियन बैरल रोजाना की क्षमता से वहां पहुंचा रही है. इस निर्यात क्षमता को दोगुना करने के लिए ADNOC एक अन्य पश्चिम-पूर्व पाइपालन पर तेज़ी से काम कर रही है, जिसे 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

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मौजूदा समझौते का एक नया रणनीतिक पहलू फुजैराह में कच्चे तेल भंडारण की सुविधा भारत द्वारा हासिल करने की चल रही चर्चा है, जिसका इस्तेमाल नई दिल्ली अपने SPR ढांचे के रूप में कर सकेगी. अगर यह संभव हो पाया, तो भारत उन बड़े एशियाई कच्चे तेल आयातकों में से एक बन जाएगा, जिसके पास आपूर्ति शृंखला के दोनों सिरों पर सामरिक भंडार होंगे- एक, देश के अंदर भूमिगत, और दूसरा, खाड़ी क्षेत्र में.


हालांकि, इस गलियारे की भी अपनी सीमाएं हैं. जब ईरान ने फ़रवरी के अंत से होर्मुज़ को बंद कर दिया, तब ADNOC को भी अपना उत्पादन कम करना पड़ा, क्योंकि अभी की पाइपलाइन उसकी सामान्य निर्यात का आधा भी नहीं ले जा पा रही थी. फुजैराह सहित अन्य ऊर्जा ढांचों पर बार-बार हुए हमलों से UAE का उत्पादन और कम हो गया है. ऐसे में, नई पाइपलाइन के चालू होने के बाद भी होर्मुज़ की तरह पूरी मात्रा में वह निर्यात नहीं कर सकता. यानी, फुजैराह गलियारा होर्मुज़ की रुकावटों को कम तो करता है, लेकिन पूरी तरह से नहीं.
1 मई, 2026 से ओपेक प्लस से UAE के बाहर निकलने से उत्पादन की गुंजाइश बढ़ गई है. ADNOC का लक्ष्य 5 मिलियन बैरल रोजाना उत्पादन करने की है. हालांकि, इसे तीन साल पहले ही हासिल कर लिया गया था, इसलिए अब इसे 6 मिलियन बैरल प्रतिदिन किए जाने की भी संभावना है. भारत को इसका लाभ मिल सकता है, क्योंकि यहां से परिवहन लागत कम है, लेकिन इसके लिए टकराव भी कम नहीं होंगे, क्योंकि होर्मुज़ संकट के कारण चीन, दक्षिण कोरिया और जापान भी फुजैराह के रास्ते तेल की आपूर्ति बढ़ाने को लेकर मिलकर काम कर रहे हैं.
भारत के ऊर्जा ढांचे की एक बड़ी कमजोरी गैस है. भारत में LPG की लगभग 80,000 टन की रोजाना खपत है, जबकि भंडारण मात्र 1.4 लाख टन है. LNG का भंडारण भी पूरी तरह से पेट्रोनेट LNG और BPCL की सुविधाओं पर निर्भर है, और इसका कोई अपना भूमिगत भंडार भी नहीं है. मई की यात्रा में भारत के अंदर रणनीतिक गैस भंडारों के संयुक्त विकास की प्रतिबद्धता जताई गई है, जो कच्चे तेल जैसा ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए भी भारत को ज़रूरी बुनियादी ढांचा बनाने होंगे.
LNG की बात करें, तो इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने पहले ही UAE के दास द्वीप स्थित संयंत्र से हर साल 1.2 मिलियन टन LNG आयात करने के लिए 7-9 अरब डॉलर का 14 वर्षीय समझौता कर रखा है, जिसकी आपूर्ति 2026 से शुरू हो जाएगी. जनवरी 2026 में HPCL और ADNOC Gas ने भी 2028 से शुरू होने वाले, सालाना 0.5 मिलियन टन LNG की आपूर्ति के लिए 10 वर्षीय समझौता किया है.
LPG की बात करें, तो भारत अपनी ज़रूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है और UAE पहले से ही उसका सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. प्रधानमंत्री के इस दौरे में, इंडियन ऑयल और ADNOC ने LPG की आपूर्ति और व्यापार के अवसरों को तलाशने के लिए एक रणनीतिक सहयोग पर रजामंदी जताई है. भारत के लिए इसका महत्व व्यापारिक विविधता से कहीं ज़्यादा है.
मई के समझौते भारत-UAE ऊर्जा संबंध को काफ़ी मज़बूत बनाते हैं. दोनों सरकारें ऊर्जा सहयोग को लंबे समय की रणनीतिक प्राथमिकता मानती है, न कि सिर्फ़ व्यापारिक लेन-देन. इसका बाज़ार और क्षेत्रीय भागीदारी, दोनों के लिहाज़ से ख़ास अर्थ है. ऐसे में, अगर प्रधानमंत्री की इस यात्रा के बाद ऊर्जा ढांचे का विस्तार होता है और उसे पूरी तरह से लागू किया जाता है, तो भारत और UAE एशिया की सबसे उन्नत द्विपक्षीय हाइड्रोकार्बन संबंध को आगे बढ़ाते दिखेंगे.
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