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अंतरिक्ष से पाताल तक अभेद्य सुरक्षा: क्या है क्वांटम कम्युनिकेशन और सेना के लिए क्यों बना वरदान?

deltin55 1 hour(s) ago views 34

सोचिए एक ऐसा खुफिया संदेश, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा हैकर या सुपरकंप्यूटर भी बीच में न तो पढ़ सके और न ही उसकी नकल कर सके। इतना ही नहीं, अगर कोई दुश्मन उस संदेश को बीच में चुपके से छूने या देखने की कोशिश भी करे, तो संदेश तुरंत अपना रूप बदल ले और भेजने वाले को पता चल जाए कि किसी ने जासूसी की है। यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि आज की हकीकत है, जिसे ‘क्वांटम कम्युनिकेशन’ कहा जाता है। डिजिटल युग में जहां एक तरफ हर चीज इंटरनेट और सैटेलाइट से जुड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ साइबर हमलों और डेटा चोरी का खतरा भी चरम पर है। आज पारंपरिक मिलिट्री सिग्नल, रेडियो फ्रीक्वेंसी और इंटरनेट को हैक करना नामुमकिन नहीं रहा। यही वजह है कि दुनिया भर की सेनाएं अब एक ऐसी तकनीक की तरफ बढ़ रही हैं, जिसे कभी हैक नहीं किया जा सकता। भारत ने भी इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपनी सेनाओं के लिए विशेष ‘मिलिट्री क्वांटम मिशन पॉलिसी फ्रेमवर्क’ को लागू कर दिया है।

यह काम कैसे करता है: सब-एटॉमिक दुनिया का अनोखा नियम

क्वांटम कम्युनिकेशन को समझने के लिए हमें सामान्य कंप्यूटर और क्वांटम दुनिया के अंतर को समझना होगा। हमारे मोबाइल और आज के सामान्य कंप्यूटर ‘बिट्स’ (0 और 1) पर काम करते हैं। जब भी आप कोई ईमेल या मैसेज भेजते हैं, तो वह 0 और 1 के कोड में बदलकर फाइबर केबल या रेडियो तरंगों के जरिए सफर करता है। चतुर हैकर्स इन तरंगों को बीच में रोककर डेटा की हूबहू नकल यानी क्लोन बना लेते हैं और आपको कानों-कान खबर भी नहीं होती। क्वांटम कम्युनिकेशन इस खेल को पूरी तरह बदल देता है। यह डेटा को तरंगों के बजाय प्रकाश के सबसे छोटे कणों, जिन्हें ‘फोटॉन’ कहते हैं, के रूप में भेजता है। यह तकनीक क्वांटम फिजिक्स के दो सबसे रहस्यमयी नियमों पर काम करती है:


सुपरपोजिशन और नो-क्लोनिंग थ्योरम

क्वांटम फिजिक्स का एक बुनियादी नियम है ‘नो-क्लोनिंग थ्योरम’। इसके अनुसार, ब्रह्मांड में किसी भी अज्ञात क्वांटम कण (जैसे फोटॉन) की हूबहू नकल या फोटोकॉपी बनाना भौतिकी के नियमों के खिलाफ है। यानी इस तकनीक से भेजे गए संदेश की कोई डुप्लिकेट कॉपी बनाई ही नहीं जा सकती।


क्वांटम एन्टैंगलमेंट

यह एक ऐसा फिनोमिना है जिसे खुद अल्बर्ट आइंस्टीन ने ‘स्पूकी एक्शन एट अ डिस्टेंस’ कहा था। इसमें दो फोटॉन कण आपस में इस तरह जुड़ जाते हैं कि चाहे वे एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर हों, अगर एक कण में कोई बदलाव होगा, तो दूसरे में भी तुरंत उसका असर दिखेगा। इसी का फायदा उठाकर वैज्ञानिक ‘क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन’ (QKD) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) का जादुई सुरक्षा चक्र



क्वांटम कम्युनिकेशन का सबसे व्यावहारिक इस्तेमाल क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) के जरिए होता है। मान लीजिए सेना के मुख्यालय से सरहद पर तैनात किसी कमांडर को एक सीक्रेट कोड भेजना है। QKD तकनीक से पहले दोनों पक्षों के बीच फोटॉन कणों की मदद से एक ‘गुप्त डिजिटल चाबी’ (Secret Key) बनाई जाती है। जब यह चाबी हवा में या फाइबर केबल में ट्रैवल कर रही होती है, और मान लीजिए कोई दुश्मन देश का हैकर इसे बीच में टैप करने की कोशिश करता है, तो भौतिकी के नियमों के कारण उन फोटॉन कणों की स्थिति तुरंत बदल जाती है। जैसे ही कणों की स्थिति बदलती है, भेजने वाले और पाने वाले दोनों को तुरंत अलर्ट मिल जाता है कि डेटा के साथ छेड़छाड़ हुई है। वह चाबी तुरंत अमान्य हो जाती है और दुश्मन के हाथ सिर्फ खाली कचरा लगता है।



रक्षा क्षेत्र और आधुनिक युद्ध में यह क्यों है सबसे बड़ा गेमचेंजर?



आधुनिक युद्ध केवल टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि सूचनाओं और खुफिया इनपुट्स से जीते जाते हैं। अगर दुश्मन को पहले ही पता चल जाए कि आपकी मिसाइल का टारगेट क्या है या सेना की टुकड़ी किधर बढ़ रही है, तो पूरी रणनीति फेल हो सकती है। रक्षा क्षेत्र में क्वांटम कम्युनिकेशन के अहम होने के कुछ बेहद पुख्ता कारण हैं:

भविष्य के क्वांटम कंप्यूटरों से सुरक्षा



आज हम अपनी सुरक्षा के लिए जिस मिलिट्री-ग्रेड एन्क्रिप्शन (जैसे 256-बिट एन्क्रिप्शन) का इस्तेमाल करते हैं, उसे तोड़ने में आज के सुपरकंप्यूटरों को भी हजारों साल लग जाएंगे। लेकिन आने वाले समय में जब शक्तिशाली ‘क्वांटम कंप्यूटर’ पूरी तरह वजूद में आ जाएंगे, तो वे इन गणितीय कोड्स को महज कुछ सेकंड या मिनटों में ही ताश के पत्तों की तरह बिखेर देंगे। ऐसे में केवल क्वांटम कम्युनिकेशन ही देश के रक्षा ढांचे को पूरी तरह सुरक्षित रख सकता है।

पनडुब्बियों के साथ गहरे समंदर में सुरक्षित संपर्क

समंदर के भीतर छिपी परमाणु पनडुब्बियों (Submarines) के साथ संपर्क साधना हमेशा से सबसे मुश्किल काम रहा है। सामान्य रेडियो तरंगें पानी के भीतर गहरे नहीं जा पातीं। वैज्ञानिक अब फ्री-स्पेस और सैटेलाइट आधारित क्वांटम कम्युनिकेशन विकसित कर रहे हैं, जिससे गहरे पानी के भीतर भी बिना हैक होने वाले सिग्नल भेजे जा सकेंगे।

परमाणु मिसाइल और कमांड कंट्रोल की सुरक्षा

परमाणु हथियारों के लॉन्च कोड और देश के प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री के बीच होने वाली हॉटलाइन बातचीत को पूरी तरह अभेद्य बनाना किसी भी देश की संप्रभुता के लिए सबसे जरूरी है। क्वांटम नेटवर्क के जरिए देश के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स को आपस में जोड़कर किसी भी तरह के विदेशी साइबर ब्लैकआउट के खतरे को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

भारत की महा-छलांग: 6000 करोड़ का नेशनल क्वांटम मिशन

भारत इस तकनीक के मामले में दुनिया के विकसित देशों से पीछे नहीं है, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है। भारत सरकार ने लगभग 6,003 करोड़ रुपये के बजट के साथ ‘नेशनल क्वांटम मिशन’ (NQM) को मंजूरी दी है। भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने ‘मिलिट्री क्वांटम मिशन पॉलिसी फ्रेमवर्क’ जारी किया है, जिसका लक्ष्य भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करना है।






भारतीय क्वांटम मिशन के मुख्य स्तंभ
रक्षा क्षेत्र में इसका सीधा फायदा




क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क
सेना और खुफिया एजेंसियों के बीच 100% सुरक्षित बातचीत




क्वांटम कंप्यूटिंग


युद्ध रणनीति, रडार डेटा और जटिल मिसाइल सिमुलेशन की तेज गणना


क्वांटम सेंसिंग और मेट्रोलॉजी
बिना जीपीएस (GPS) के भी सटीक नेविगेशन और दुश्मन के स्टील्थ विमानों को पकड़ना




भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर खुली हवा में (Free Space) कई किलोमीटर दूर तक सफलतापूर्वक क्वांटम कम्युनिकेशन का सफल परीक्षण किया है। इसके साथ ही भारत में अब 2,000 किलोमीटर से भी लंबा सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है, जो दिल्ली से लेकर चेन्नई जैसे बड़े रणनीतिक केंद्रों को सुरक्षित रूप से जोड़ देगा।

क्वांटम वैली और आत्मनिर्भरता का नया अध्याय
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