
नई दिल्ली: अमेरिका में रूस को लेकर उठाए गए एक बड़े कदम ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है. अमेरिकी सीनेट ने रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने से जुड़े एक अहम विधेयक को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है. यदि यह बिल आगे की सभी संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी कर कानून बन जाता है, तो रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं. भारत, जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है, इस प्रस्तावित व्यवस्था से प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों में शामिल है.

यह विधेयक रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है. इसका मकसद यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आय के प्रमुख स्रोतों को कमजोर करना और उन देशों पर भी दबाव बनाना है, जो अब भी रूसी ऊर्जा संसाधनों की खरीद जारी रखे हुए हैं. इस प्रस्ताव को दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था. इसे ऐसे समय सीनेट में पेश किया गया, जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की अमेरिका के दौरे पर थे. अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि रूस की ऊर्जा बिक्री पर अंकुश लगाकर उस पर आर्थिक दबाव और बढ़ाया जा सकता है.


रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में भारत का नाम प्रमुखता से आता है. चीन के बाद भारत रूस का दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार माना जाता है. इसी वजह से यदि यह विधेयक कानून बनता है और राष्ट्रपति इसकी कुछ धाराओं को लागू करते हैं, तो भारत पर भी अधिकतम 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का विकल्प खुल सकता है. हालांकि, यह टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा. अंतिम निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में रहेगा और कुछ देशों या विशेष परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान भी रखा गया है.
इस विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी सीनेट में मतदान कराया गया, जिसमें 86 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि 12 सांसदों ने विरोध में वोट दिया. इस समर्थन के साथ अब विधेयक सीनेट में विस्तृत चर्चा और अंतिम मतदान के अगले चरण में पहुंच गया है. बताया जा रहा है कि इस बिल के 60 से अधिक सह-प्रायोजक पहले से मौजूद हैं. इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पारित होने की संभावना काफी मजबूत है.

फिलहाल यह विधेयक कानून नहीं बना है. अभी यह केवल शुरुआती संसदीय प्रक्रिया पार कर पाया है. यदि सीनेट में अंतिम मतदान के बाद इसे मंजूरी मिलती है, तो इसे अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स भेजा जाएगा. फिलहाल हाउस अवकाश पर है और अगस्त के अंत में दोबारा बैठक शुरू होने की संभावना है. वहां से मंजूरी मिलने के बाद यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही यह विधेयक कानून का रूप लेगा. इसके बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर रूस पर प्रतिबंध लागू किए जाएंगे, जबकि टैरिफ लागू करने या किसी देश को राहत देने का अंतिम फैसला राष्ट्रपति करेंगे.
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है. पहले भारत के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता था, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता के चलते भारतीय रिफाइनरियों ने वैकल्पिक स्रोत के रूप में रूसी तेल पर अधिक भरोसा किया. यही कारण है कि प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंध भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए हैं.
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत भारत के अलावा चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों का भी नाम सामने आया है. इन देशों की रूसी ऊर्जा पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से टैरिफ और अन्य आर्थिक उपायों का विकल्प रखा गया है. हालांकि, अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल पहले यह संकेत दे चुके हैं कि कुछ परिस्थितियों में सीमित रूसी गैस आयात करने वाले देशों को छूट मिल सकती है. इसी आधार पर अमेरिका ने अपने कुछ यूरोपीय सहयोगियों के लिए राहत का प्रावधान भी रखा है.
|