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विवादों में उलझा झारखंड-बिहार का सीमांकन, ग्रामीणों और कर्मचारियों के बीच नहीं बनी सहमति

Chikheang 2025-12-11 18:38:01 views 948
  

मापी को लेकर विचार-विमर्श करते किसान। जागरण



जागरण संवाददाता, साहिबगंज। झारखंड-बिहार का सीमांकन विवादों में उलझ गया है। बुधवार को सीमांकन करने पहुंची टीम बैरंग लौट गई। दूसरे दिन भी ग्रामीणों व कर्मचारियों के बीच सहमति नहीं बनने से मापी नहीं हो सकी। दोनों जिला के अंचल कर्मचारी हाई कोर्ट के आदेश पर 2018 में हुई मापी के दौरान गाड़े गए सीमेंट के पिलर को आधार मानकर मापी करना चाहते थे, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि मापी जब भी होगी तो साहिबगंज के तेलियागढ़ी से होगी या पीरपैंती से होगी। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

ग्रामीणों के अनुसार तीन मौजा के सेंटर से कड़ी गिराने पर 40-40 चैन बाबुपुर व मखमलपुर में प्रवेश करता है जो जमीन अर्सेक्षित है। ग्रामीण इस स्थल से मापी को तैयार नहीं हैं।

अंचल कर्मियों का कहना था कि पूर्व में गाड़े गए पिलर से मापी करने पर बिहार के बाबुपुर व बैजनाथपुर तथा झारखंड के साहिबगंज सदर प्रखंड के मखमलपुर मौजा का मिलान हो जाता है। अब वरीय अधिकारियों से इस मामले पर चर्चा की जाएगी जिसमें बाद मापी होगी।
क्या है मामला?

1985 से बाबुपुर, बैजनाथपुर व मखमलपुल (साहिबगंज) के सीमांकन को लेकर किसानों के बीच लंबी लड़ाई चल रही है। सीमांकन नहीं होने से मखमलपुर के किसान को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। दबंग हजारों एकड़ जमीन को जबरन कब्जा किए हुए हैं। किसान कार्यालय व व्यवहार न्यायालय का चक्कर लगाते लगाते थक गए।

मो. मुस्तका नामक किसान ने 2014 में हाइकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें झारखंड के साथ-साथ बिहार सरकार को पार्टी बनाया गया। कोर्ट ने 2018 में ही दोनों जिलों के उपायुक्त को सीमांकन कराने का आदेश दिया था। तत्कालीन डीसी संदीप सिंह के नेतृत्व में दोनों जिला के कर्मचारियों ने मापी शुरू की, लेकिन विवाद बढ़ जाने की वजह से मापी स्थगित करनी पड़ी। पुन: एक बार हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया है।


संयुक्त बिहार के तीन मौजा के सीमांकन को लेकर 1985 से लड़ाई लड़ रहा हूं। झारखंड अलग होने के बाद भी हम किसानों को इंसाफ नहीं मिला। कार्यालय का चक्कर लगाकर थक गया। हमारी सौ बीघा से अधिक जमीन दबंगों ने कब्जा कर रखा है। हजारों किसान अपनी जमीन रहते हुए भी भुखमरी के कगार पर हैं। इंसाफ के लिए 2014 में हाइकोर्ट का शरण में गया। पहली बार आदेश पर 2018 में सीमांकन को लेकर टीम आयी लेकिन सफल नहीं हो सकी। दोबारा पुन: दोनों जिला के टीम आयी है। अभी तक बात नहीं बन सकी है। आशा करता हू कि इस बार हम किसानों को इंसाफ जरूर मिलेगा। - मो. मुस्ताक, हाई कोर्ट याचिकाकर्ता
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