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जागरण संवाद सूत्र, राजनगर (सरायकेला-खरसावां)। जंगलों में पाई जाने वाली लाल चींटी और उसके अंडों से बनी पारंपरिक चटनी इन दिनों कोल्हान क्षेत्र के हाट-बाज़ारों में आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बड़े साल और पलाश के पत्तों में सजी यह चटनी न केवल अपने तीखे और अनोखे स्वाद के लिए जानी जाती है, बल्कि आदिवासी समुदाय के लिए यह स्वास्थ्य का अमूल्य खजाना भी मानी जाती है। कोल्हान क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी हो समुदाय इसे हाउ चटनी कहते हैं, जबकि स्थानीय बोलियों में इसे कुरकुटी, केंकुआ या झिंगिया चटनी के नाम से भी जाना जाता है।
जंगलों से जुटाई जाती हैं लाल चींटियां और अंडे ग्रामीण इलाकों में सुबह-सुबह महिला और पुरुष जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। पेड़ों पर बने लाल चींटियों के घोंसलों को सावधानीपूर्वक उतारकर उसके अंदर मौजूद चींटियों और उनके सफेद अंडों को इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद इन्हें साफ कर पत्तों पर फैलाया जाता है और चटनी बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में जहां नए घोंसले मिलते हैं, वहां चींटियां और अंडे अधिक मात्रा में होते हैं। इनका स्वाद भी ज्यादा तीखा और ताजा माना जाता है। अधिकांशतः सर्दियों के मौसम में ही लाल चींटियां अधिक पाई जाती हैं, इसलिए इसी समय इसकी उपलब्धता और मांग दोनों बढ़ जाती हैं।
पोषण से भरपूर है लाल चींटी राजनगर के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. एसएम. देमता के अनुसार लाल चींटियों और उनके अंडों में पोषक तत्वों की मात्रा अत्यंत अधिक होती है। इनमें लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक प्रोटीन, साथ ही विटामिन बी-12, आयरन, कैल्शियम, जिंक, एंटीऑक्सीडेंट और प्राकृतिक फॉर्मिक एसिड पाया जाता है। लाल चींटी की चटनी का स्वाद बेहद तीखा और अलग होता है। इसे आमतौर पर लहसुन, हरी या सूखी मिर्च, नमक और कभी-कभी टमाटर के साथ पीसकर तैयार किया जाता है। आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों का मानना है कि यह चटनी ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखती है और स्फूर्ति प्रदान करती है। ग्रामीणों के अनुसार यह चटनी एनीमिया में लाभकारी है, पाचन क्रिया को दुरुस्त करती है, सर्दी-जुकाम से बचाव में मदद करती है तथा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करती है।
हाट-बाज़ार में बढ़ी मांग, महिलाओं की आमदनी में इजाफा कोल्हान के विभिन्न ग्रामीण हाट-बाजारों में इन दिनों लाल चींटी की चटनी की अच्छी मांग देखने को मिल रही है। चाईबासा, खरसावां, कुचाई, राजनगर, सरायकेला और हल्दीपोखर जैसे हाटों में ग्रामीण महिलाएं इसे पत्तों में सजाकर 20 से 30 रुपये की कीमत पर बेच रही हैं।
राजनगर हाट की एक महिला विक्रेता बताती हैं कि सर्दियों और त्योहारों के समय इसकी बिक्री काफी बढ़ जाती है। लोग इसे खास स्वाद के लिए खरीदते हैं, वहीं कुछ परिवार इसे दवा की तरह घर में भी रखते हैं। इससे स्थानीय महिलाओं की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है।
परंपरा और स्वास्थ्य का अनोखा संगम लाल चींटी की चटनी जहां आदिवासी संस्कृति और परंपरा की पहचान है, वहीं अब यह आधुनिक समय में “सुपरफूड” के रूप में भी अपनी जगह बना रही है। जंगलों से निकलकर यह चटनी अब शहरों तक पहचान बना रही है। भले ही बड़े शहरों में इसे कीड़े-मकोड़े समझा जाए, लेकिन ग्रामीण समाज अच्छी तरह जानता है कि इसके सेवन से क्या-क्या फायदे मिलते हैं। यही कारण है कि लोग इसे आज भी बड़े चाव से खाते हैं और अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। |