सुंदर कांड में हनुमान जी और माता सीता की भेंट का प्रेरक प्रसंग पढ़ने को मिलता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीराम की महिमा अपरंपार है। उनकी भक्ति करने वाले साधक जीवन में हमेशा अजेय रहते हैं। रामजी का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बाल्यावस्था सुख से बीता लेकिन जब अयोध्या नरेश बनने वाले थे। उससे एक दिन पूर्व राजा दशरथ ने उन्हें 14 वर्षों का वनवास गमन का आदेश दिया। पिता के आदेश को कर्तव्य मानकर भगवान श्रीराम, अपनी धर्मपत्नी माता सीता और अनुज लक्ष्मण जी के साथ 14 वर्षों तक वनवास में रहें। इस दौरान लंकापति रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया।
सीता हरण के वियोग में भगवान राम और अनुज लक्ष्मण जी वन में भटकने लगे। उस समय उनकी भेंट वानरराज सुग्रीव और परम सेवक हनुमान जी से होती है। प्रभु श्रीराम को व्यथित देखकर हनुमान जी चिंतित हो उठे। इसके बाद प्रभु के आदेश पाकर हनुमान जी लंका जा पहुंचे। यहां उनकी भेंट माता सीता से होती है। जहां माता सीता, हनुमान जी को आराध्य भगवान श्रीराम के लिए गुप्त संदेश देती हैं, इस संदेश में दशानन रावण की तकदीर लिखी थी। आइए, इस प्रसंग के बारे में जानते हैं-
सुंदर कांड की चौपाई
तात सक्रसुत कथा सनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
राम भक्त तुलसीदास गोस्वामी जी की रचना सुंदर कांड में हनुमान जी और माता सीता की भेंट का प्रेरक प्रसंग पढ़ने को मिलता है। लंका दहन के बाद हनुमान जी, माता सीता से मिलने अशोक वाटिका (Hanuman in Ashoka Vatika) पहुंचते हैं। जहां शिष्टाचारपूर्वक प्रणाम कर हनुमान जी अपनी माता सीता का कुशल-मंगलजानते हैं।
माता सीता से संवाद के बाद विदाई लेने के समय हनुमान जी पहचान मांगते हैं। उस समय माता सीता चूड़ामणि उतारकर देती हैं। चूड़ामणि देते समय माता सीता कहती हैं- तात! अपने प्रभु से जयंत की कथा सुनाना। उन्हें कहना कि एक महीने में अगर लंका नहीं आए, तो उन्हें जीतना (रावण से छुड़ाना) मुश्किल हो जाएगा।
उन्हें अपनी शक्ति का याद दिलाना। धर्म जानकारों की मानें तो माता सीता के इस संदेश में रावण की तकदीर छिपी थी। कालांतर में भगवान श्रीराम ने वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई कर दी। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया था।
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