जम्मू-कश्मीर प्रशासन अब सख्ती बरत रहा है।
दिनेश महाजन, जम्मू। म्यांमार और जम्मू-कश्मीर के बीच न तो भौगोलिक निकटता है और न ही सामाजिक-सांस्कृतिक समानता। इसके बावजूद बीते लगभग दस वर्षों में बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमानों का जम्मू क्षेत्र में पहुंचना और यहां स्थायी रूप से बस जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार यह घटनाक्रम संयोगवश नहीं बल्कि चरणबद्ध और सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाया गया। शुरुआत मानवीय सहायता, आजीविका और शरण देने की दलीलों के साथ हुई, लेकिन समय के साथ इसके पीछे छिपा एजेंडा स्पष्ट होता गया।
बाहरी नेटवर्क, एजेंटों और कुछ तथाकथित गैर सरकारी संगठनों ने मिलकर रोहिंग्याओं को जम्मू तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था की। इन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि जम्मू में धार्मिक पहचान सुरक्षित रहेगी और रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।
इसी भरोसे के सहारे रोहिंग्या परिवार यहां पहुंचे और धीरे-धीरे विशेष इलाकों में बसाए गए। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य जम्मू के जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित करना था। मौजूदा हालात में यह मुद्दा केवल अवैध प्रवास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा, सामाजिक ताने-बाने और कानून-व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन चुका है।
एनजीओ व मजहबी संगठनों से योजनाबद्ध तरीके से जम्मू में बसाया
मुताबिक अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड से सटी म्यांमार सीमा के बजाय रोहिंग्या शरणार्थियों को बांग्लादेश के रास्ते कोलकाता और फिर दिल्ली लाया गया। पश्चिम बंगाल के मालदा और दिल्ली में सक्रिय तथाकथित एनजीओ व मजहबी संगठनों ने इन्हें जम्मू-कश्मीर को सुरक्षित मुस्लिम बहुल क्षेत्र बताकर जम्मू में बसने के लिए प्रेरित किया।
जम्मू पहुंचने पर इन शरणार्थियों को पहले मस्जिदों और मदरसों में ठहराया गया, बाद में जम्मू, सांबा और बाड़ी ब्राह्मणा की झुग्गियों में बसाया गया। इससे न केवल जनसंख्या संतुलन बदला, बल्कि कुछ मामलों में रोहिंग्याओं को ओवर ग्राउंड वर्कर और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए भी इस्तेमाल करने के प्रयास सामने आए हैं।
जम्मू की पाकिस्तान से सटी सीमा और पहले से मौजूद बाहरी आबादी के कारण आम लोगों के लिए अवैध प्रवासियों की पहचान भी मुश्किल होती गई। हालात को देखते हुए अब सुरक्षा एजेंसियां और प्रशासन किरायेदार सत्यापन, अवैध बिजली-पानी कनेक्शन और दस्तावेजों की सघन जांच के जरिए सख्ती बरत रहे हैं।
सैकड़ों रोहिंग्या युवतियों की कराई गई शादी
सरकारी आकंड़ों से अलग जम्मू-कश्मीर में हजारों की संख्या में रोहिंग्या नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं, जिनमें से 5 से 6 हजार से ज्यादा केवल जम्मू जिले में बसे हैं। सूत्रों के अनुसार इन्हें बसाने से फर्जी दस्तावेज तक उपलब्ध कराए गए थे। सैकड़ों रोहिंग्या युवतियों को म्यांमार से विशेष तौर पर बुला कर एजेंटों के नेटवर्क के जरिए उनकी शादी स्थानीय निवासियों से कराई गई।
अधिकारियों का कहना है कि ऐसी शादियां रणनीतिक रूप से कराई जाती हैं, ताकि शरणार्थी समाज में घुल-मिल जाएं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की नजर से बच सकें। बीते कुछ समय में सुरक्षा एजेंसियों ने कई ऐसे लोगों पर मामले भी दर्ज किए है, जिन्होंने रोहिंग्या युवतियों से सरकार को बिना सूचित किए शादियां की है। |
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