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दुद्धी से सपा विधायक विजय सिंह गोंड का लखनऊ में निधन, पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने परिवार को दी सांत्वना

Chikheang 3 day(s) ago views 736
  

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ विजय सिंह गाेंड (फाइल फाेटाे)  



जागरण संवाददाता, लखनऊ : सोनभद्र के दुद्धी से समाजवादी पार्टी के विधायक विजय सिंह गोंड का गुरुवार को लखनऊ में निधन हो गया। 71 वर्षीय सपा विधायक विजय सिंह गोंड लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई में क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में भर्ती थे। चिकित्सकों के अनुसार मल्टी ऑर्गन फेल्योर के चलते उनका निधन हुआ।

विजय सिंह गोंड लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। विधायक विजय सिंह गोंड की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी। हालांकि तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।

विधायक के निधन की सूचना मिलते ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सीधे पीजीआई पहुंचे। अखिलेश यादव ने दोपहर करीब एक बजे शोक संतप्त परिजनों से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी। सपा नेता अवध नारायण यादव ने बताया कि शुक्रवार को विजय सिंह गोंड का दुद्धी के कमहर घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा। इसके पहले पार्थिव शरीर को डीसीएफ कॉलोनी के गोंडवाना भवन में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा।

विजय सिंह गोंड दुद्धी विधानसभा क्षेत्र से आठ बार विधायक रहे थे। वह मुलायम सिंह यादव सरकार में राज्यमंत्री भी रहे। कांग्रेस नेता रामप्यारे पनिका ने विजय सिंह को राजनीति में आगे बढ़ाया था, लेकिन बाद में विजय सिंह ने अपने गुरु को ही हराकर नया इतिहास रचा था।

उत्तर प्रदेश के अंतिम विधानसभा क्षेत्र दुद्धी के सपा विधायक विजय सिंह गोंड ने 2024 के उपचुनाव में भाजपा के श्रवण गोंड को 3160 मतों से हराया था। इससे पहले 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में रामदुलार गोड़ को 6297 मतों के भारी अंतर से हराया था।

दुद्धी विधानसभा (403) आदिवासी बाहुल्य आरक्षित सीट है, जहां विजय सिंह गोंड ने लगातार सात बार जीते। लगभग तीन वर्ष पहले भाजपा के पूर्व विधायक को दुष्कर्म के आरोप में सजा होने के बाद हुए उपचुनाव में विजय सिंह गोंड़ ने सपा के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। विजय सिंह गोंड़ ने दुद्धी और ओबरा विधानसभा को अनुसूचित जनजाति सीट घोषित कराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी।

वनवासी सेवा आश्रम में मात्र 200 रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत रहते हुए उन्होंने 1979 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1989 में अपने राजनीतिक गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर उन्होंने आदिवासी राजनीति में नया अध्याय लिख दिया। विभिन्न दलों से होते हुए वे लगातार सात बार विधानसभा के सदस्य रहे। आठवीं बार 2022 में वह विधायक बने थे।
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