हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को निर्देश दिया है कि 15 दिन के भीतर फ्लैट आवंटित करे।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ स्माल फ्लैट्स स्कीम-2006 के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि शहरी गरीबों के पुनर्वास से संबंधित कल्याणकारी योजनाओं को तकनीकी आपत्तियों के आधार पर विफल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने चंडीगढ़ प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह एक युवती को 15 दिन के भीतर फ्लैट आवंटित करे, जो योजना के तहत कराए गए बायोमीट्रिक सर्वे के समय न केवल नाबालिग थी, बल्कि मां के गर्भ में भी थी।
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रशासन के आदेश को रद कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि किसी मान्यता प्राप्त निवासी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके नाबालिग वारिसों के अधिकारों को मान्यता देने पर प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हाशिए पर रह रहे वर्गों के पुनर्वास से जुड़े मामलों में संवैधानिक अदालतों को संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय समग्र और उदार रवैया अपनाना चाहिए, ताकि योजना का मूल उद्देश्य ही विफल न हो।
यह है मामला
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में, मात्र नौ वर्ष की आयु में अपने चाचा के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसके पिता वर्ष 1994 से बुड़ैल स्थित लेबर कालोनी नंबर-5 की झुग्गी में रह रहे थे।
स्थायी लोक अदालत ने मार्च 2010 में उन्हें स्माल फ्लैट आवंटन के लिए पात्र घोषित किया था। हालांकि, 15 फरवरी 2013 को फ्लैट आवंटित होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। याचिकाकर्ता की मां वर्ष 2014 से लापता है, जिसकी डीडीआर भी दर्ज कराई गई थी।
सर्वे के समय गर्भ में थी याचिकाकर्ता
चंडीगढ़ प्रशासन ने याचिकाकर्ता का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसका नाम न तो बायोमीट्रिक सर्वे में दर्ज है और न ही मतदाता सूची में, साथ ही योजना में नाबालिग को फ्लैट देने का कोई प्रविधान नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जब पिता को पात्र घोषित किया जा चुका था, तो केवल आवंटन में देरी और बीच में मृत्यु हो जाने के कारण उसकी संतान के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि चंडीगढ़ स्माल फ्लैट्स स्कीम का उद्देश्य अति-हाशिए पर रह रहे झुग्गीवासियों का पुनर्वास करना और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवास उपलब्ध कराना है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में आश्रय का अधिकार भी शामिल है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य को कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और असाधारण परिस्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर कमजोर वर्गों की पीड़ा को कम करना ही संवैधानिक न्याय का उद्देश्य है। |
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