जानें क्यों होता है सेफ्टी पिन में छोटा छेद (Picture Credit- AI Generated)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कहते हैं, \“देखने में छोटन लगे, घाव करे गंभीर\“, लेकिन सेफ्टी पिन के मामले में यह कहावत बदलकर बन जाती है- \“काम करे गंभीर\“। चाहे साड़ी की प्लीट्स को अपनी जगह पर टिकाना हो, प्राथमिक चिकित्सा (First-Aid) में मदद करनी हो, या फिर स्कूल के साइंस प्रोजेक्ट में पवनचक्की घुमानी हो- मुड़े हुए तार का यह छोटा सा टुकड़ा हर जगह मौजूद है।
हम इसे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इतना इस्तेमाल करते हैं कि कभी रुककर सोचा ही नहीं कि आखिर इस \“जादुई पिन\“ का ख्याल सबसे पहले किसके दिमाग में आया होगा? चलिए, आज आपको इस छोटे, मगर काम के आविष्कार के बड़े इतिहास और इसकी खास बनावट के बारे में-
खास है सेफ्टी पिन की बनावट
अगर आपने कभी ध्यान से देखा होगा, तो सेफ्टी पिन की बनावट और काम करने का तरीका काफी अनोखा पाया होगा। हम सभी ने इसके पीछे मौजूद छोटा-सा छेद जरूर देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह छेद क्यों बनाया गया। दरअसल, सेफ्टी पिन का डिजाइन बहुत ही वैज्ञानिक है। इसमें मुख्य रूप से दो हिस्से होते हैं, जो इसके काम करने के लिए जरूरी हैं:
- नीचे का गोलाकार स्प्रिंग (The Spring): पिन के निचले हिस्से में तार को मोड़कर एक छल्ला या कॉइल बनाया जाता है। अगर आप इसे सिर्फ एक डिजाइन मानते हैं, तो आपको बता दें कि यह सिर्फ एक डिजाइन नहीं, बल्कि यह एक स्प्रिंग का काम करता है। यह स्प्रिंग पिन में \“तनाव\“ (tension) पैदा करता है, जिससे पिन का नुकीला सिरा ऊपर वाले खांचे में कसकर फंसा रहता है और तब तक वहीं टिका रहता है, जब तक आप उसे खोलने के लिए पर्याप्त फोर्स नहीं लगाते। अगर यह तनाव न हो, तो पिन बार-बार खुल जाएगी और आपको चोट लग सकती है।
- ऊपर का गार्ड (The Head/Guard): यह वह हिस्सा है, जहां पिन का नुकीला सिरा सुरक्षित रहता है। यह हिस्सा इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह पिन को बंद रखता है और आपको इससे चुभने से बचाता है।
सेफ्टी पिन के बनने की कहानी
आपने शायद सोचा ही न हो कि इस पिन का इस्तेमाल आज आप कर रहे हैं, वह कब-कैसे और किसने बनाई। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज हम जिस सेफ्टी पिन का इस्तेमाल करते हैं, उसका आविष्कार वॉल्टर हंट ने साल 1849 में किया था। उन्होंने तार के एक टुकड़े को मोड़कर यह स्प्रिंग वाला सिस्टम बनाया था।
खास बात यह है कि वॉल्टर हंट को यह अंदाजा भी नहीं था कि उनकी यह खोज कितनी कीमती है। शायद इसलिए उन्होंने इसका पेटेंट सिर्फ 400 डॉलर में बेच दिया था, जबकि बाद में कंपनियों ने इससे करोड़ों कमाए।
सेफ्टी पिन का इतिहास
सेफ्टी पिन का इतिहास काफी पुराना है। लैटिन भाषा में इसे \“फिबुले\“ (Fibulae) कहा जाता था और इसकी शुरुआत यूरोप में \“कांस्य युग\“ (Bronze Age) के दौरान हुई थी। उस समय इसे बनाने के दो मुख्य तरीके प्रचलन में थे:
- उत्तरी यूरोप का तरीका (दो पिन वाला): उत्तरी यूरोप में जो पिन इस्तेमाल की जाती थी, वह दो अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बनती थी। इसमें स्प्रिंग (लचकदार घुमाव) नहीं होता था। इसमें एक पिन में छेद होता था और दूसरी पिन उस छेद से गुजरकर एक हुक में फंसती थी। यह थोड़ी जटिल बनावट थी।
- मध्य यूरोप, ग्रीस और इटली का तरीका (एक पिन वाला): यहां बनाई जाने वाली पिन आज की मॉडर्न सेफ्टी पिन से काफी मिलती-जुलती थी। यहां इस्तेमाल होने वाली पिन सिर्फ एक तार से बनी होती थी। इसमें बीच में एक घुमाव (स्प्रिंग) होता था, जिससे इसमें लचक आती थी।
तार का एक सिरा नुकीला होता था और दूसरा सिरा मुड़ा हुआ, ताकि नुकीले हिस्से को इसमें फंसाया जा सके। पुराने समय के पिन और आज के पिन में सबसे बड़ा अंतर यह है कि आज के आधुनिक पिन में सुरक्षा के लिए ऊपर एक \“कैप\“ या गार्ड होता है, जो पुराने पिनों में नहीं था।
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