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ताऊ पर था किशोरी की परवरिश का जिम्मा, उसी ने लूट ली अस्मत; कानपुर में गिरफ्तार

cy520520 10 hour(s) ago views 810
  



जागरण संवाददाता, कानपुर। किदवई नगर के बाद बर्रा में गुरुवार को रिश्तों को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई, जहां 13 वर्षीय किशोरी से उसके सगे ताऊ ने दुष्कर्म किया। घटना के वक्त घर में कोई नहीं था। किशोरी ने पड़ोस में रहने वाली महिला की मदद से पुलिस को सूचना दी।

चार साल पहले पति की हत्या में मां के जेल जाने के बाद पीड़िता बाबा और ताऊ के साथ रह रही थी। शुक्रवार को बाबा की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करके पुलिस ने आरोपित को जेल भेज दिया।

पुलिस के मुताबिक गुरुवार शाम सूचना मिली कि ताऊ ने भतीजी से दुष्कर्म किया है। पुलिस पहुंची तो किशोरी ने बताया कि पिता की मौत और मां के जेल जाने के बाद वह छोटे भाई-बहनों के साथ बाबा और ताऊ के साथ रहने लगी थी।

एक साल पहले ताऊ ने नशे की हालत में उसके साथ गलत करने की कोशिश की थी, जिसका विरोध कर बाबा से शिकायत की थी। इस पर बाबा ने ताऊ को फटकारा था। गुरुवार शाम बाबा बाजार गए थे।

छोटे भाई-बहन घर के बाहर खेल रहे थे। इसी दौरान ताऊ ने उसे कमरे में घसीट लिया। इसके बाद मुंह दबाकर दुष्कर्म किया। डीसीपी दक्षिण दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया कि किशोरी का मेडिकल कराने के बाद आरोपित को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
बुजुर्ग के कांपते कंधों पर तीन मासूमों का बोझ

अभी जिन आंखों में बच्चों के भविष्य के सपने थे, आज उन्हीं आंखों में चिंता की गहरी रेखाएं खिंची हैं। उम्र के आठ दशक पार कर चुके बुजुर्ग बाबा के लिए जिंदगी अब किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं है। एक नहीं, बल्कि तीन-तीन मासूम जिंदगियों की जिम्मेदारी उनके कांपते कंधों पर आ टिकी है।

परिवार की त्रासदी की कहानी चार साल पहले शुरू हुई थी। अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर बच्चों की मां जेल चली गई। उसके जेल जाने के बाद तीनों बच्चों का सहारा सिर्फ बाबा और ताऊ ही रह गए। पेट पालने के लिए बाबा जहां भीख मांगने को मजबूर हुए, वहीं ताऊ मजदूरी कर जैसे-तैसे घर का खर्च चला रहा था, लेकिन एक झटके में बच्चों से उनका आखिरी सहारा भी छिन गया।

अब घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा। तीनों बच्चों की आंखों में अनिश्चित भविष्य का डर था तो 80 साल के बाबा के चेहरे पर लाचारी और बेबसी साफ झलक रही थी।

बाबा बोले, जिस उम्र में लाठी का सहारा होना चाहिए, उस उम्र में बच्चों का सहारा बनना पड़ रहा है। समझ नहीं आता कल क्या होगा। रोजमर्रा की जरूरतें, बच्चों की परवरिश और समाज की नजरें उनके लिए पहाड़ बन गए हैं।
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