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खाते में थे 25 लाख, फिर भी इलाज के अभाव में शिक्षिका ने तोड़ा दम; मौत के 2 घंटे बाद पहुंचा बैंक

Chikheang 3 day(s) ago views 605
  

जमशेदपुर में अंजल‍ि बोस के निधन के बाद विरोध जताते उनके परिजन।



जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। झारखंड के जमशेदपुर से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने न केवल बैंकिंग सिस्टम बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोनारी निवासी और झारखंड सरकार की सेवानिवृत्त शिक्षिका अंजलि बोस की मौत ने यह कड़वा सवाल छोड़ दिया है कि क्या सरकारी नियम और बैंक की पेचीदा प्रक्रियाएं इंसान की जिंदगी से भी बड़ी हो गई हैं?   
पूंजी अपनी, पर इलाज को मोहताज अंजलि बोस अविवाहित थीं और उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई करीब 25 लाख रुपये भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की सोनारी शाखा में जमा कर रखे थे। दुर्भाग्यवश, उन्होंने खाते में किसी को \“नॉमिनी\“ (वारिस) नहीं बनाया था।    जब उनकी तबीयत बिगड़ी और डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए उन्हें बड़े अस्पताल में रेफर करने की सलाह दी, तो परिजनों को लगा कि उनकी जमा पूंजी उनके काम आएगी। लेकिन यहीं से व्यवस्था की संवेदनहीनता का दौर शुरू हुआ।   
भटकती रही बहन, नहीं पसीजा बैंक अंजलि बोस की छोटी बहन गायत्री बोस अपनी बड़ी बहन की जान बचाने के लिए दर-दर भटकती रहीं। उन्होंने बार-बार बैंक अधिकारियों को जानकारी दी कि अंजलि की स्थिति नाजुक है और अस्पताल के बिल भरने व रेफर करने के लिए पैसों की तत्काल जरूरत है।    लेकिन हर बार बैंक की ओर से एक ही रटा-रटाया जवाब मिला-नॉमिनी नहीं है, कानूनी अड़चनें हैं। लिहाजा परिजन थक हारकर बैठ गए। स्पताल के बिस्तर पर एक शिक्षिका जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही, और दूसरी तरफ बैंक के नियम फाइल के पन्नों में उलझे रहे।   
देर से जागा प्रशासन, तब तक थम चुकी थीं सांसें

मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा के पूर्व नेता विकास सिंह ने इसमें हस्तक्षेप किया। उन्होंने सीधे उपायुक्त (DC) को मामले की जानकारी दी। प्रशासन के दबाव के बाद बैंक अधिकारी सक्रिय तो हुए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

शुक्रवार सुबह 8:00 बजे इलाज के अभाव और समय पर पैसे न मिलने के कारण अंजलि बोस का निधन हो गया। शुक्रवार सुबह 10 बजे बैंक के अधिकारी नकदी लेकर अस्पताल पहुंचे।

जिस मदद के लिए स्वजन कई दिनों से गुहार लगा रहे थे, वह अंजलि बोस की मौत के दो घंटे बाद एमजीएम अस्पताल पहुंची। यह दृश्य देखकर परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। अधिकारियों ने वहां माफी जरूर मांगी, लेकिन क्या एक माफी उस जान की भरपाई कर सकती है जो बचाई जा सकती थी?   
सिस्टम पर सवाल: \“रॉबोटिक\“ हो गई है प्रक्रिया

परिजनों ने कहा कि यदि बैंक अधिकारियों ने मानवीय आधार पर यह सक्रियता 24 घंटे पहले दिखाई होती, तो अंजलि बोस आज हमारे बीच होतीं। यह घटना स्पष्ट करती है कि हमारा बैंकिंग ढांचा कितना \“रॉबोटिक\“ और संवेदनहीन हो गया है, जहां आपात स्थिति में भी नियमों को लचीला बनाने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती।
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