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मनरेगा के सिस्टम में ही छुपी थी फर्जीवाड़े की गुंजाइश, सिर्फ कागजों पर हुए थे करोड़ों के काम

Chikheang Yesterday 20:26 views 678
  

शुरुआती वर्षों में योजना की निगरानी और रिकॉर्ड व्यवस्था बेहद कमजोर थी



अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में वर्षों तक चले फर्जीवाड़े को अगर सिर्फ भ्रष्टाचार कहकर अनदेखी कर दी जाए तो पूरा सच नहीं होगा। वास्तविकता यह भी है कि प्रारंभ में मनरेगा का सिस्टम ही ऐसा बनाया गया था, जिसने गड़बड़ियों, लूट एवं फर्जीवाड़े को आसान कर दिया। ग्रामीण विकास मंत्रालय की निगरानी जांच में बात आई कि शुरुआती वर्षों में योजना की निगरानी और रिकॉर्ड व्यवस्था बेहद कमजोर थी।

कई जगह करोड़ों रुपये के काम कागजों में दिखाए गए, लेकिन जमीन पर न सड़क बनी, न तालाब और न ही मेड़। काम की न तस्वीरें होती थीं, न उसकी लोकेशन दर्ज होती थी और न ही कोई पुख्ता रिकार्ड रखा जाता था। निरीक्षण की व्यवस्था भी लगभग नाम की थी, जिससे फर्जी परिसंपत्तियां सालों तक फाइलों में बनी रहती थीं। उनका रखरखाव भी कागजों पर दिखाया जाता रहा और भुगतान होता रहा।
श्रमिकों की पहचान भी बड़ी समस्या थी

मनरेगा की यह पूरी कहानी यही बताती है कि जब व्यवस्था ढीली होती है तो फर्जीवाड़े का रास्ता अपने आप बन जाता है। श्रमिकों की पहचान भी बड़ी समस्या थी। एक ही व्यक्ति के नाम पर कई जाब कार्ड बना दिए जाते थे। कई मामलों में मृत लोगों के नाम पर भी मजदूरी का भुगतान होता रहा। असली मजदूरों तक पूरा पैसा पहुंचने के बजाय बिचौलियों की एक पूरी श्रृंखला सक्रिय थी, जो नीचे से ऊपर तक सिस्टम में घुसी हुई थी।

जनवरी 2014 तक हालत यह थी कि सिर्फ करीब 76 लाख श्रमिकों के ही आधार नंबर मनरेगा रिकार्ड से जुड़े थे, जबकि योजना में करोड़ों लोग दर्ज थे।भुगतान की प्रक्रिया ने इस गड़बड़ी को और बढ़ाया। मजदूरी का पैसा पंचायत से ब्लाक, फिर जिला और अंत में बैंक तक मैन्युअल पहुंचता था। हर स्तर पर देरी होती थी और कटौती व कमीशन का खेल चलता था। चूंकि पैसा सीधे मजदूर के खाते में नहीं जा पाता था, इसलिए लीकेज सिस्टम का हिस्सा बन चुका था और गरीब मजदूर सबसे ज्यादा नुकसान में रहता था।
परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग अनिवार्य

पंचायत स्तर पर रिकॉर्ड की स्थिति भी बदहाल थी। फील्ड कर्मचारियों को 22 से 29 अलग-अलग रजिस्टर भरने पड़ते थे। इतने ज्यादा रजिस्टरों में गलती, हेरफेर और मनमानी की संभावना स्वाभाविक थी। इसी अव्यवस्था से फर्जी मस्टर रोल बने और गलत भुगतान होते रहे।2014 के बाद पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश शुरू हुई। 2016 में मनरेगा के तहत बनी परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग अनिवार्य कर दी गई।

अब हर काम की फोटो और उसकी जीपीएस लोकेशन सिस्टम में दर्ज होने लगी। श्रमिकों की पहचान को मजबूत करने के लिए आधार सीडिंग पर जोर दिया गया। आज 12.11 करोड़ से अधिक सक्रिय श्रमिकों के आधार नंबर मनरेगा से जुड़े हैं। भुगतान व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव हुआ। आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम और नेशनल इलेक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए मजदूरी सीधे बैंक खातों में भेजी जाने लगी। ई-पेमेंट का अनुपात, जो पहले 37 प्रतिशत था, अब सौ प्रतिशत तक पहुंच गया।

यह भी पढ़ें- करनाल: मनरेगा का नाम बदलने के खिलाफ कांग्रेस का हल्लाबोल, एक दिवसीय उपवास रख जताया विरोध
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