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मिडिल क्लास के बजट से बाहर हो रहे मकान, सपना होता जा रहा है घर; नीति आयोग की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

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आम मिडिल क्लास की पहुंच से दूर होता जा रहा है घर



राजीव कुमार, नई दिल्ली। कोरोना काल के बाद देश में किफायती मकान का स्टॉक घटता जा रहा है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से किफायती मकान (40 लाख से कम कीमत वाले) और मिड रेंज मकान (40-80 लाख कीमत वाले) की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है और यह आम मिडिल क्लास की पहुंच से दूर होता जा रहा है।

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इन तथ्यों का खुलासा करते हुए किफायती मकान की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इस प्रकार के मकान निर्माता के लाभ को टैक्स से छूट देने के साथ जमीन के इस्तेमाल की शर्तों में बदलाव के साथ उन्हें कम ब्याज दरों पर लंबे समय के लिए कर्ज मुहैया कराने की सिफारिश की है। आयोग ने सरकार से किराए के मकान को भी बढ़ावा देने वाली नीति बनाने के लिए कहा है। आयोग का कहना है कि अभी देश में एक करोड़ से अधिक मकान खाली है जिनका कोई उपयोग नहीं हो रहा है।
किराए से बेहतर खाली रखना समझते हैं लोग

इन मकानों के कम किराए और किराए पर देने पर मकान कब्जा लेने व टैक्स के झंझटों को देखते हुए लोग मकान को किराए पर देने से बेहतर उसे खाली रखना समझते हैं। इस प्रकार की दिक्कतों को दूर करने की दिशा में नियम बनाने होंगे। नीति आयोग के मुताबिक वर्ष 2019 में मकान के स्टॉक में किफायती मकान की 40 प्रतिशत तो मिड रेंज की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत थी जो वर्ष 2024 में 16 और 28 प्रतिशत रह गई।

वहीं लग्जरी मकान (1.5 करोड़ से 2.5 करोड़) की हिस्सेदारी वर्ष 2019 में सिर्फ चार प्रतिशत थी जो वर्ष 2024 में बढ़कर 16 प्रतिशत हो गई। आयोग के मुताबिक वैश्विक मानकों के हिसाब से देखा जाए तो देश के मेट्रो व अन्य शहरी इलाकों को मिलाकर 5-7 करोड़ मकान की जरूरत है। वैश्विक मानकों में मकान के लिविंग एरिया व सफाई, गंदे पानी की निकासी जैसी चीजें शामिल होती हैं। आयोग के मुताबिक पिछले कुछ सालों में मकान के निर्माण की लागत में होने वाली तेज बढ़ोतरी से भी किफायती मकान के निर्माण में कमी आई है।

पिछले चार-पांच सालों में मकान की निर्माण लागत में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है, लेकिन आम लोगों की मासिक तनख्वाह में इस अनुपात में इजाफा नहीं हुआ है। इसलिए वे मकान खरीदने में खुद को सक्षम नहीं पा रहे हैं। किफायती मकान के निर्माण में सस्ती जमीन की कमी सबसे बड़ा रोड़ा है क्योंकि शहर में मकान के निर्माण की लागत में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी जमीन की होती है। विभिन्न राज्यों में जमीन के इस्तेमाल को लेकर स्वतंत्रता भी नहीं है। कम शुल्क लेकर आसानी से जमीन के इस्तेमाल में बदलाव करने की सिफारिश की गई है।
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