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महिला अधिवक्ता से दुष्कर्म मामला: आरोपी अधिवक्ता को नहीं मिली गिरफ्तारी सुरक्षा, HC ने कहा- न्याय प्रणाली का मजाक उड़ाया

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। 27 साल की एक महिला अधिवक्ता के साथ दुष्कर्म करने और बाद में दो न्यायिक अधिकारियों के माध्यम उसे प्रभावित करने की कोशिश करने के आरोपित अधिवकता को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा देने से दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को इनकार कर दिया।

दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के संबंध में जानकारी देने के बावजूद भी न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने राहत देने से इनकार कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि आरोपित और शिकायतकर्ता ने एक-दूसरे पर आरोप लगाने व न्यायिक अधिकारियों को शामिल करने के बाद मामला सुलझाकर न्याय प्रणाली का मजाक उड़ाया है।

पीठ ने कहा कि अदालत नहीं जानती कि मामले की सच्चाई क्या है और समय बीतने के साथ यह मामला ज्यादा उलझता जा रहा है। ऐसे में अदालत आरोपित अधिवक्ता को गिरफ्तारी से कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करेगी। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत याचिकाकर्ता को नियमित जमानत के लिए आवेदन करने से लेकर किसी भी कानूनी प्रक्रिया को अपनाने से नहीं रोकेगी।

अदालत ने उक्त टिप्पणियां आरोपित अधिवक्ता द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कीं। याचिका में मामले में अग्रिम जमानत और उसके खिलाफ दायर मामला रद करने की मांग की गई थी। महिला अधिवक्ता ने 51 वर्षीय अधिवक्ता पर दुष्कर्म, आपराधिक धमकी और मारपीट का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।

जून 2025 में नेब सराय पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी में हुई थी। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपित अधिवक्ता ने शादी का झांसा देकर पांच साल में कई बार उसके साथ जबरदस्ती की और वह गर्भवती हो गई। पुलिस ने कहा कि दक्षिण दिल्ली के एक कंट्री क्लब में महिला के साथ मारपीट की और यह घटना सीसीटीवी फुटेज में कैद हुई।

आरोपित अधिवक्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिमन्यु भंडारी ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने शिकायतकर्ता पर दबाव डालने के लिए किसी भी न्यायिक अधिकारी से संपर्क नहीं किया था। उन्होंने कहा कि आरोपित और शिकायतकर्ता के बीच झगड़ा हुआ था और इसके प्राथमिकी हुई। उन्होंने महिला अधिक्ता पर उनके मुवक्किल से वसूली का आरोप लगाया था, लेकिन मामला सुलझ गया है और सभी आरोप वापस ले लिए गए हैं।

हालांकि, पीठ ने कहा कि इस मामले में, इससे पहले की परिस्थितियों को देखते हुए समझौता आपसी सहमति से नहीं हो सकता। पीठ ने कहा कि अधिवक्ता धमकी देते हैं, जज धमकी देते हैं, और फिर आप कह रहे हैं कि यह आपसी सहमति से हुआ है। इससे पहले 29 अगस्त को एक पूर्ण कोर्ट की बैठक में हाई कोर्ट ने जिला जज संजीव कुमार सिंह को निलंबित कर दिया था और महिला की शिकायत के आधार पर उनके और एक अन्य जज अनिल कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।
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