इस वर्ष चार ग्रहण होगा और उनमें से मात्र एक का ही प्रभाव देश में देखने को मिलेगा।
शैलेश अस्थाना, जागरण, वाराणसी। इस वर्ष चार ग्रहण की घटनाएँ सामने आएंगी मगर इनमें से भारत में केवल एक का दृश्य दिखेगा। वर्ष 2026 में खगोलीय घटनाओं की श्रृंखला में कुल चार ग्रहणों का होना निश्चित है, जिनमें दो सूर्य ग्रहण और दो चंद्रग्रहण शामिल हैं।
हालांकि, इस वर्ष केवल एक चंद्रग्रहण भारत में दिखाई देगा और उसी का प्रभाव भी पड़ेगा। जबकि अन्य तीन ग्रहण देश में नहीं देखे जा सकेंगे। ज्योतिष के अनुसार, भारत में दृश्यमान ग्रहण काल के दौरान सूतक का प्रभाव होता है। इस बार तीन मार्च को लगने वाला खग्रास उदित चंद्रग्रहण ही भारत में देखा जाएगा।
इस कारण, तीन मार्च को सूतक काल मान्य होगा। सूतक काल सुबह 9:39 बजे से प्रारंभ होकर ग्रहण समाप्ति के साथ शाम 6:46 बजे तक रहेगा। चंद्रग्रहण चंद्रोदय के साथ शाम 6:26 बजे प्रारंभ होकर 6:46 बजे समाप्त होगा। इसके बाद, दूसरा चंद्रग्रहण 28 अगस्त को लगेगा, जो भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए, इस पर सूतक काल लागू नहीं होगा। यह ग्रहण उत्तर और दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में देखा जा सकेगा।
इससे पूर्व, वर्ष का पहला सूर्यग्रहण अमावस्या तिथि में 17 फरवरी को लगेगा। यह ग्रहण भी भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इस पर सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसके बाद, साल का दूसरा सूर्यग्रहण 12 अगस्त को होगा, जो पूर्ण सूर्य ग्रहण रहेगा। यह भी भारत में नजर नहीं आएगा और इसे स्पेन, रूस और पुर्तगाल के कुछ हिस्सों में देखा जा सकेगा। धार्मिक दृष्टि से भारत में इसका कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा।
ग्रहणों के इन खगोलीय घटनाक्रमों का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। सूतक काल के दौरान, कई धार्मिक मान्यताएँ और परंपराएँ जुड़ी होती हैं। इस समय को अशुभ माना जाता है और लोग पूजा-पाठ में लीन रहते हैं। चंद्रग्रहण के दौरान, विशेष रूप से चंद्रमा की स्थिति का ध्यान रखा जाता है, क्योंकि इसे मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस वर्ष के ग्रहणों की घटनाएँ खगोल विज्ञान के प्रति लोगों की रुचि को और बढ़ाएंगी। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ग्रहणों का अध्ययन करने से हमें ब्रह्मांड की संरचना और उसके कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिलती है। इस प्रकार, ये खगोलीय घटनाएँ न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। काशी के ज्योतिषाचार्यों के अनुसार होली पर होने वाला ग्रहण ही प्रभावकारी होगा। इसके अतिरिक्त बाकी तीन अन्य का प्रभाव नहीं होगा। |