कम फेलोशिप और लेट लतीफी ने बिगाड़ा रिसर्च ग्राफ। जागरण
जागरण संवाददाता, वाराणसी। एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में विज्ञान संकाय के कई विभागों मेें पीएचडी की 60 प्रतिशत सीटें खाली रहेंगी। कारण कि पिछले शैक्षणिक सत्रों की तरह वर्ष 2025-26 की प्रवेश प्रक्रिया में भी छात्र दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।
सर्वाधिक असर भौतिकी, रसायन विज्ञान और भू-भौतिकी जैसे विभागों में देखने को मिल रहा है। सिर्फ जंतु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और भू-विज्ञान विभाग की स्थिति बेहतर है, जबकि दर्जनभर विभागों में रिसर्च प्रोजेक्टों पर संकट मंडराने लगा है। विभागों के शिक्षक चिंतित हैं कि वह शोध कार्य कैसे पूर्ण करेंगे। नए प्रोजेक्ट कैसे शुरू किए जा सकेंगे।
फिलहाल उनकी उम्मीद टूट चुकी है, क्योंकि माह के पहले सप्ताह से शुरू हुई इंटरव्यू प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है। अभ्यर्थियों की योग्यता का आकलन किया जाने लगा है। संभव है कि जिन अभ्यर्थियों ने साक्षात्कार प्रक्रिया में हिस्सा लिया है, उन्हें योग्यता की कसौटी पर फेल होने पर प्रवेश नहीं मिल सके। भौतिकी विभाग में करीब 104 सीटों की तुलना में सिर्फ 33 अभ्यर्थी ही इंटरव्यू प्रक्रिया में हिस्सा लिए हैं जबकि 95 से अधिक अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए काल किया गया था।
इसी तरह, रसायन विभाग की 108 सीटों के लिए करीब 54 छात्र ही साक्षात्कार प्रक्रिया का हिस्सा बने, जबकि सौ से अधिक अभ्यर्थियों को आमंत्रित किया गया था। भू-भौतिकी विभाग की करीब 21 सीटों की तुलना में 17 अभ्यर्थियों ने इंटरव्यू दिया है, जबकि करीब 50 लोगों को काल किया गया था।
विज्ञान संकाय के विभागों में सीटें रिक्त रहने की समस्या पिछले तीन वर्षों से बनी है, इसके लिए भौतिकी विभाग ने कुलपति को पत्र भी लिखा है। चिंताजनक स्थिति से अवगत कराते हुए विशेष रिसर्च एंट्रेंस टेस्ट कराए जाने की सिफारिश की है।
यह भी कहा है कि अगर यही स्थिति रही तो शोध उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और विवि की रैंकिंग भी गिर सकती है। राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआएफ) और अन्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर विवि को नुकसान झेलना पड़ सकता है। भौतिकी में वर्ष 2023 में केवल 10 छात्रों ने प्रवेश लिया जबकि वर्ष 2025 में 11 छात्रों ने ही प्रवेश लिया था। शिक्षकों का कहना है कि भौतिकी और केमिस्ट्री जैसे विभागों में शोधार्थी नहीं मिलना चिंता का विषय है,
क्योंकि इन्हीं विभागों से महान विभूतियां निकली हैं। प्रवेश प्रक्रिया करीब एक साल विलंबित चल रही है।
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विलंब से प्रवेश शुरू होगा तो जाहिर है कि अच्छे छात्र दूसरे विश्वविद्यालयों या तकनीकी संस्थानों में प्रवेश ले लिए होंगे। वह बीएचयू की प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार कब तक करेगा। इसके अलावा बीएचयू के शोधार्थियों को सिर्फ आठ हजार रुपये प्रतिमाह फेलोशिप मिलती है, जबकि आइआइटी व दूसरे संस्थानों में 30 से 35 हजार रुपये तक मिलते हैं।
पीएचडी में प्रवेश के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा आयोजित करता है लेकिन परिणाम जारी किए जाने में हमेशा ही विलंब होता है। पहले वर्ष में दो बार आरईटी होता था, लेकिन अब एक बार भी समय पर नहीं हो पा रहा है। पिछले सत्र में प्रवेश में गड़बड़ी किए जाने के गंभीर आरोप भी लगे और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश के तीन विश्वविद्यालयों के कुलपति से जांच भी कराई। फिजिक्स और केमिस्ट्री जैसे विभागों से ही विश्वविद्यालयों की रैंकिंग तय होती है, इसलिए ऐसे अभ्यर्थियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इन विभागों को विशेष फायदा देना चाहिए।
सीटें खाली नहीं जाए, शिक्षकों का यह सुझाव
- वर्ष में दो बार (मई से जून और नवंबर से दिसंबर) में प्रवेश प्रक्रिया पूर्ण की जाए और रिसर्च इंट्रेंस टेस्ट (आरईटी) परीक्षा की नए सिर से शुरुआत हो। टीचिंग असिस्टेंटशिप शुरू किया जाए और पीएचडी फेलोशिप के लिए बंदोबस्ती कोष स्थापित किया जाना चाहिए।
- बीएचयू को अपनी आरईटी परीक्षा दोबारा शुरू करनी चाहिए जैसा कि देश के कुछ अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों में प्रभावी है।
- पात्रता के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (एनईटी) के साथ ही ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (गेट), ज्वाइंट एंट्रेंस स्क्रीनिंग टेस्ट (जेस्ट), प्रेरित अनुसंधान के लिए विज्ञान में नवाचार (इंसपायर) फेलोशिप आदि योग्यता प्राप्त छात्रों पर भी विचार हाे।
- संबद्ध विषयों का समावेश किया जाना चाहिए। आवेदकों की संख्या बढ़ाने के लिए एमएससी इलेक्ट्रानिक्स विज्ञान, नैनोसाइंस और नैनोटेक्नोलाजी, खगोल भौतिकी एवं खगोल विज्ञान, सामग्री विज्ञान, बायोफिजिक्स, फोरेंसिक विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान जैसे विषयों को संबद्ध विषयों में शामिल किया जाए।
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