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Supreme Court: इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 13 वर्षों से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने “निष्क्रिय इच्छामृत्यु“ शब्द का प्रयोग करने से परहेज किया है।
अदालत ने टिप्पणी की, “हम हर दिन मामलों पर फैसला करते हैं, लेकिन ये मुद्दे संवेदनशील हैं। हम भी इंसान हैं - कौन जिएगा और कौन मरेगा, यह तय करने वाले हम कौन होते हैं?“ इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला ने कहा कि पीठ जीवन रक्षक चिकित्सा उपचार बंद करने के विकल्प पर विचार करेगी।
बता दें कि हरीश के माता-पिता का प्रतिनिधित्व करने वाले एमिकस क्यूरी और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं एएसजी ऐश्वर्या भाटी द्वारा विस्तृत दलीलें प्रस्तुत करने के बाद अदालत ने ये टिप्पणियां कीं।
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कोर्ट में सुनवाई के दौरान, एमिकस क्यूरी ने हरीश के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग की और इसे प्राकृतिक मृत्यु को त्वरित करने का मामला बताया। वकील ने दो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि हरीश के ठीक होने की संभावना नही है। उन्होंने कहा, “इस तरह के उपचार जारी रखना गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।“
क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु
निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) किसी मरीज को जानबूझकर मरने देने का वह कार्य है जिसमें जीवन रक्षक उपकरण या जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक उपचार को रोक दिया जाता है या वापस ले लिया जाता है।
हरीश राणा केस
बता दें कि हरीश, दिल्ली के महावीर एन्क्लेव का रहने वाला है। वह किशोर उम्र में पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ गया था। लेकिन 20 अगस्त 2013 को राणा परिवार की दुनिया तब पूरी तरह बदल गई, जब हरीश अपने पीजी (पेइंग गेस्ट) आवास की चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गया।
इस हादसे में उसे सिर में गंभीर चोटें आईं और वह 100 प्रतिशत दिव्यांग हो गया। तब से हरीश स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है। वह सांस लेने और पोषण के लिए पूरी तरह ट्यूबों पर निर्भर है।
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