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आप भी हर बार लेट हो जाते हैं? दोष आपका नहीं, आपके दिमाग की वायरिंग का है; पढ़ें क्या कहती है साइंस

Chikheang 3 hour(s) ago views 77
  

चाहकर भी वक्त पर नहीं पहुंच पाते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)



लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर बार ‘बस 5 मिनट में पहुंच रहा हूं’ कहते हैं, लेकिन असल में काफी देर से पहुंचते हैं। अक्सर देर से पहुंचने वाले लोगों को काफी गैर-जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन हर बार लापरवाही देर होने की वजह नहीं होती। दरअसल एक स्टडी में पता चला है कि बार-बार देर करने की आदत के पीछे न्यूरोसाइंस से जुड़े कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं।  

जी हां, यानी व्यक्ति का दिमाग भी उसे कई बार देर करवा देता है, लेकिन अक्सर लोगों का ध्यान इस बात की ओर जाता नहीं है। आइए जानें लेट करने के आदत के पीछे दिमाग से जुड़े कौन-से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।  
क्या है \“टाइम-ब्लाइंडनेस\“?

दरअसल, बार-बार लेट होने के पीछे एक बड़ी वजह \“टाइम-ब्लाइंडनेस\“ (Time-Blindness) हो सकती है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति का दिमाग समय का सही आकलन नहीं कर पाता है। ऐसे लोगों को यह समझ नहीं आता कि कोई खास काम कितना समय लेगा या समय किस गति से बीत रहा है। यह समस्या सीधे तौर पर दिमाग की उन क्षमताओं से जुड़ी है जो प्लानिंग, प्रायोरिटी सेट करने और सेल्फ कंट्रोल का काम संभालती हैं।

  

(Picture Courtesy: Freepik)
रिसर्च के चौंकाने वाले आंकड़े

येल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार, अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) से ग्रस्त 70 से 80 प्रतिशत वयस्क समय के अनुमान में गंभीर चूक करते हैं। वहीं, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की रिसर्च बताती है कि हाई मेंटल डिस्ट्रैक्शन वाले लोग किसी काम में लगने वाले समय को वास्तविक समय से 30 से 40 प्रतिशत तक कम आंकते हैं। उन्हें लगता है कि वे समय पर हैं, जबकि वे पहले ही लेट हो चुके होते हैं।
दिमाग और समय का कनेक्शन

डॉ. गीता ग्रोवर (UCI Health) के अनुसार टाइम ब्लाइंडनेस जानबूझकर नहीं किया जाता। यह समझना जरूरी है कि यह व्यक्ति के दिमाग के काम करने का तरीका है न कि आलस्य।  

ऐसे लोगों का दिमाग समय को एक सीधी रेखा की तरह देखने के बजाय बिखरे हुए टुकड़ों में देखता है। यही कारण है कि बार-बार अलार्म या डेडलाइन की वॉर्निंग भी उनके लिए बेअसर साबित होती हैं।  

इतना ही नहीं, इसके पीछे और भी कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, जैसे-  

  • व्यवहारिक पैटर्न- कुछ लोग अनजाने में ही अपने दिमाग में अपने समय को दूसरों से ज्यादा कीमती मानने लगते हैं।  
  • सोशल एंग्जायटी- ज्यादा लोगों से मिलने में हिचकिचाहट महसूस करने वाले लोग समय से पहले पहुंचकर होने वाली असहजता से बचने के लिए जानबूझकर देर करते हैं।
  • स्मार्टफोन का असर- लगातार नोटिफिकेशन और मल्टी-टास्किंग की आदत हमारे दिमाग की समय पहचानने की क्षमता को कमजोर कर रही है।

कैसे सुधारें समय पर पहुंचने की आदत?

अच्छी खबर यह है कि दिमाग को समय का पालन करने के लिए \“री-ट्रेन\“ किया जा सकता है। इसके लिए कुछ आसान लेकिन असरदार तरीके अपनाए जा सकते हैं-

  • एनालॉग घड़ी का इस्तेमाल- डिजिटल के बजाय सूइयों वाली एनालॉग घड़ी पहनना समय बीतने का बेहतर अहसास कराता है।
  • कामों को बांटें- अपने बड़े कामों को छोटे-छोटे स्टेज में बांटें और हर स्टेप के लिए एक फिक्स समय तय करें।
  • चेकलिस्ट बनाएं- फोन पर निर्भर रहने के बजाय खुद अपने हाथ से टाइम-लिस्ट बनाएं और स्टेप-बाय-स्टेप चेकलिस्ट का इस्तेमाल करें।
  • फोन से दूरी- बार-बार फोन देखना समय को समझने की क्षमता को कम करता है, इसलिए जरूरी अलार्म का इस्तेमाल करें लेकिन फोन से दूरी बनाए रखें।

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Source:

  • UCI Health
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