कुमार संजय, लखनऊ। चिंता, अवसाद, आत्महत्या की प्रवृत्ति, नशे की लत, नींद न आना और गंभीर मानसिक रोग, यह बीमारियां घरेलू एवं बचपन में हुई यौन हिंसा की अदृश्य, लेकिन गहरी चोटें भी होती हैं। चिकित्सकीय शोध बताते हैं कि यह हिंसा एक तरह की खामोश, लेकिन गंभीर रोग है, जो शरीर से ज्यादा मन, सोच और भविष्य को बीमार करता है। यह चौकाने वाला तथ्य एसजीपीजीआइ सहित दुनिया के 204 देशों के विशेषज्ञों के शोध में सामने आया है।
नए अध्ययन के अनुसार, भारत में 30 प्रतिशत लड़कियां और 13 प्रतिशत लड़के अठारह वर्ष की उम्र से पहले ही यौन हिंसा का शिकार हो जाते हैं, जबकि 15 वर्ष से अधिक उम्र की लगभग हर चौथी महिला अपने जीवन में कभी न कभी घरेलू हिंसा झेलती है। उत्तर प्रदेश में प्रत्येक तीन में से एक लड़की घरेलू और यौन हिंसा की शिकार है, जो चिंता का विषय है।
शोध के अनुसार, घरेलू और यौन हिंसा के शिकार लोगों में मानसिक बीमारियों का खतरा कई गुणा अधिक पाया गया। इनमें चिंता विकार, गंभीर अवसाद, आत्महत्या, नींद से जुड़ी बीमारियां, नशे की लत और व्यवहार संबंधी विकार प्रमुख हैं। बचपन में हुई यौन हिंसा का असर बढ़ती उम्र में स्कित्जोफ्रेनिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी के रूप में भी सामने आता है। इसके साथ ही कुछ दीर्घकालिक शारीरिक बीमारियों और संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। पीड़ित व्यक्ति की समय से पहले मौत हो जाती है या फिर जीवनभर बीमारी और मानसिक पीड़ा के साथ जीने को मजबूर रहता है।
कैसे हुआ शोध
यह अध्ययन बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज अध्ययन-2023 के तहत किया गया। इसमें वर्ष 1990 से 2023 तक दुनियाभर से प्राप्त सर्वे, आंकड़ों, स्वास्थ्य अभिलेखों और जनसंख्या अध्ययन का विश्लेषण किया गया है।
एसजीपीजीआइ की महत्वपूर्ण भूमिका
अंतरराष्ट्रीय शोध में उत्तर प्रदेश से संजय गांधी पीजीआइ ने लखनऊ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्थान में अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रो. डा. राजेश हर्षवर्धन और डा. मेहविश सुहैब ने अध्ययन में प्रमुख योगदान दिया। डा. हर्षवर्धन के अनुसार, शोध में उत्तर प्रदेश से चार करोड़ लड़कियों को शामिल किया गया।
यह अध्ययन वर्ष 2019 से 2023 तक किया गया। शोध को विश्व की प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका द लांसेट ने “डिजीज बर्डन एट्रिब्यूटेबल टू इंटीमेट पार्टनर वायलेंस अगेंस्ट फीमेल्स एंड सेक्सुअल वायलेंस अगेंस्ट चिल्ड्रन इन टू हंड्रेड फोर कंट्रीज़ एंड टेरिटरीज़”शीर्षक के साथ हाल में ही स्वीकार किया है।
बच सकती है ज़िंदगी
प्रो. राजेश हर्षवर्धन के मुताबिक, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा को यदि केवल सामाजिक बुराई मानकर नजरअंदाज किया गया तो इसके आने वाले समय में इसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे। समय पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता, रोकथाम और पीड़ित की पहचान कर लाखों जिंदगियों को टूटने से बचाया जा सकता है।
ऐसे करें बचाव
-केवल अजनबी नहीं, परिचितों से भी सतर्क रहें
-बच्चों को अच्छे-बुरे स्पर्श का स्पष्ट ज्ञान दें
-असहज स्थिति में तुरंत ‘ना’ कहना सिखाएं
-बच्चों से खुलकर, भरोसे का संवाद बनाए रखें
-अकेले में मिलने की परिस्थितियों पर नजर रखें
-आनलाइन गतिविधियों और संपर्क की निगरानी करें
-व्यवहार में बदलाव दिखे तो गंभीरता से लें
-बच्चों की बात पर भरोसा करें, तुरंत फटकार न लगाएं
-समय-समय पर काउंसिलिंग करें |