India vs China Air pawar: इंडियन एयर फोर्स मौजूदा समय में फाइटर जेट की भारी कमी से जूझ रहा है, जबकि भारत एयर पावर के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश हैं. मौजूदा समय में भारत के पास कुल 600 फाइटर जेट हैं, अब 114 नए फाइटर जेट खरीदे जा रहे हैं. इस पर भी देश में बहस चल रही है कि भारत को राफेल इतनी बड़ी संख्या में राफेल खरीदना चाहिए या नहीं. जबकि उतने ही पैसे में 5वीं पीढ़ी के 230 फाइटर जेट मिल रहे हैं. दूसरी तरफ भारत को 2-2 मोर्चे पर तैयारी करनी है.
कहा तो जा रहा है कि 114 राफेल फाइटर जेट की डील चीन और पाकिस्तान से संयुक्त रूप से मुकाबले के लिए खरीदे जा रहे हैं. इससे डिटरेंस पावर बढ़ेगी, लेकिन चीन की भारत से कई कदम आगे हैं. ऐसे में जानिए कितना ताकतवर है, चीन और उसकी भविष्य की फाइटर फ्लीट की क्या योजनाएं हैं.
भारत से 4 कदम आगे चाइना का फाइटर जेट प्रोग्राम
भारत मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम के तहत प्रक्रिया शुरू होने के लगभग आठ साल बाद अब जाकर रक्षा मंत्रालय (MoD) भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का लगभग ₹3.25 लाख करोड़ (36 अरब डॉलर) का बड़ा सौदा साइन करने की स्थिति में है. इसके उलट, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) ने सिर्फ 2025 में ही लगभग 120 J-20A और J-20S स्टेल्थ फाइटर शामिल कर लिए. इसके अलावा उसी साल चीन ने J-16, J-15 और J-10 जैसे 100 से 170 अन्य लड़ाकू विमान भी जोड़े. यानी एक ही साल में चीन ने करीब 300 नए फाइटर अपने बेड़े में शामिल कर लिए.
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) के अनुमान के मुताबिक 2030 तक चीन के पास लगभग 1,000 J-20 स्टेल्थ फाइटर और 900 J-16 विमान हो सकते हैं. इसके अलावा J-35 स्टेल्थ फाइटर भी बड़ी संख्या में शामिल किए जा सकते हैं, जिनकी तकनीक J-20 पर आधारित होगी.
भारत का ढुलमुल रवैया खतरनाक
इतने बड़े खतरे के बावजूद भारत में अब भी यह बहस चल रही है कि ज्यादा राफेल खरीदने की जरूरत है या नहीं. हैरानी की बात यह है कि रूस की पेशकश को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जबकि IAF खुद मान चुकी है कि उसे तुरंत 2–3 स्क्वाड्रन स्टेल्थ फाइटर की जरूरत है. IAF की स्क्वाड्रन संख्या 42 से घटकर 29 रह जाने की बड़ी वजह तेजस प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी है. सरकार और रक्षा मंत्रालय इन देरी को दूर करने में असफल रहे, जिससे वायुसेना की ताकत कमजोर होती चली गई. ‘मेक इन इंडिया’ जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि अगर देश की सुरक्षा ही कमजोर हो जाए तो इसका क्या फायदा? सच्चाई यह है कि भारत के पास अभी भी जेट इंजन, एडवांस सेंसर और हाई-एंड मटीरियल जैसी कई अहम तकनीकों की मजबूत औद्योगिक क्षमता नहीं है.

रक्षा खरीद और मेक इन इंडिया अलग-अलग हों
भारत की सबसे बड़ी गलती यह रही है कि रक्षा तैयारी को पूरी तरह ‘मेक इन इंडिया’ से जोड़ दिया गया. इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है. किसी भी देश को तत्काल जरूरत के हथियार खरीदने चाहिए, जबकि तकनीक और उद्योग का विकास एक समानांतर, लंबी प्रक्रिया होनी चाहिए. राफेल सौदे में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर न मिलने की बात बार-बार उठाई जाती है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि डसॉल्ट जैसी निजी कंपनी अपनी मुख्य तकनीक आसानी से साझा नहीं कर सकती हैं. भारत को हर फाइटर डील में पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जिद छोड़नी होगी. जरूरी तकनीकों जैसे इंजन के लिए अलग से समझौते किए जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, सफ्रान और GTRE मिलकर AMCA के लिए इंजन विकसित करने की तैयारी में हैं.
भारत चीन को कैसे दे पाएगा टक्कर
भारत चीन और पाकिस्तान को 114 राफेल से टक्कर नहीं दे सकता है. हालांकि मौजूदा समय में पाकिस्तान के डिटरेंस पावर भारत के लिए काफी है. ऐसे में 114 राफेल सिर्फ जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. अगर चीन को टक्कर देना है, तो भारत को 114 राफेल के अलावा 60 SU- 57 की डील जल्दी करनी चाहिए. इसके अलावा तेजस मार्क-1 के तेज प्रोडक्शन और तेजस मार्क-2 और AMCA प्रोजेक्ट को रफ्तार देना चाहिए.
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