दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती की याचिका खारिज कर दी है। एआई जेनरेटेड
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (आप) नेता सोमनाथ भारती की याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने मालवीय नगर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक सतीश उपाध्याय की 2025 विधानसभा चुनाव में हुई जीत को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया, जिसमें याचिका को खारिज करते हुए सतीश उपाध्याय की जीत को बरकरार रखा गया है। विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा।
मालवीय नगर सीट पर फरवरी 2025 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के सतीश उपाध्याय ने आप के सोमनाथ भारती को हराया था। उपाध्याय ने कुल 39,564 मत हासिल कर जीत दर्ज की थी, जबकि भारती उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी थे। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मार्च 2025 में सोमनाथ भारती ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा के तहत उपाध्याय पर \“भ्रष्ट आचरण\“ का आरोप लगाया था।
भारती का दावा था कि उपाध्याय ने नामांकन पत्र में अपने खिलाफ लंबित आपराधिक शिकायत या एफआईआर की जानकारी छिपाई थी, जो चुनावी प्रक्रिया में गंभीर उल्लंघन है।सुनवाई के दौरान उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नय्यर ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट से पूछा कि यदि कोई एफआईआर लंबित है तो उसकी कॉपी या विवरण कहां है। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने भारती से ठोस सबूत और एफआईआर की पुष्टि मांगी।
कोर्ट ने कई बार भारती को स्पष्ट करने का मौका दिया कि आरोप कितने पुख्ता हैं। अप्रैल 2025 में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भारती पर सख्त टिप्पणी की थी कि यदि आरोप सिद्ध नहीं हुए तो झूठे हलफनामे के लिए परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अंततः कोर्ट ने याचिका में पर्याप्त सबूत न होने के आधार पर इसे खारिज कर दिया।यह फैसला दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि 2025 चुनावों में कई सीटों पर हारने वाले उम्मीदवारों ने चुनावी जीत को चुनौती दी थी।
मालवीय नगर सीट दक्षिण दिल्ली का एक प्रमुख क्षेत्र है, जहां भाजपा ने मजबूत पकड़ बनाई है। फैसले के बाद सतीश उपाध्याय की विधायकी सुरक्षित हो गई है, जबकि सोमनाथ भारती को कानूनी चुनौती में झटका लगा है।यह घटना राजनीतिक दलों के बीच चुनावी नैतिकता और पारदर्शिता पर बहस को फिर से तेज कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ठोस सबूतों की कमी से याचिकाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
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