BMC में बीजेपी की एंट्री शिवसेना का 27 साल का राज खत्म (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। करीब चार साल की देरी और लंबे समय तक प्रशासक शासन के बाद हुए महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव 2026 ने राज्य की शहरी राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। 29 नगर निगमों और 2869 सीटों पर हुए इन चुनावों को सिर्फ स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि पार्टियों की राजनीतिक साख और भविष्य की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा था। नतीजे बेहद साफ रहे सत्ता पक्ष महायुति का जबरदस्त दबदबा।
इन चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति ने महाराष्ट्र के 29 में से 25 नगर निगमों में जीत दर्ज की। सबसे बड़ा उलटफेर मुंबई में देखने को मिला, जहां 227 सदस्यीय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) में महायुति ने बहुमत हासिल कर लिया।
इसके साथ ही 1997 से चला आ रहा शिवसेना का बीएमसी पर कब्जा खत्म हो गया। यह बीजेपी के लिए एक ऐतिहासिक जीत है, क्योंकि पहली बार उसने देश के सबसे अमीर नगर निगम पर सीधा नियंत्रण हासिल किया है।
जीत के हीरो
बीजेपी और उसके नेता देवेंद्र फडणवीस इस चुनाव के सबसे बड़े विजेता बनकर उभरे। अकेले बीजेपी ने बीएमसी में 89 से ज्यादा वार्ड जीते, जो 2017 के मुकाबले ज्यादा हैं। मुलुंड पश्चिम जैसे इलाकों में पार्टी ने एमएनएस को 12 हजार से अधिक वोटों से हराया।
मुंबई के अलावा बीजेपी ने नवी मुंबई, कल्याण-डोंबिवली, मीरा-भायंदर, नासिक, पनवेल, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़, सोलापुर, छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़ और नागपुर जैसे बड़े शहरों में भी शानदार जीत दर्ज की। पुणे और नागपुर जैसे शहरों में बीजेपी स्पष्ट बहुमत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के सालाना बजट वाली बीएमसी पर नियंत्रण से बीजेपी को 2029 के विधानसभा चुनावों से पहले मजबूत संस्थागत बढ़त मिल गई है।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के लिए भी यह चुनाव अहम साबित हुआ। 2022 में पार्टी टूटने के बाद उनकी सबसे बड़ी चुनौती वैधता की थी, जिसे इन नतीजों से मजबूती मिली। पार्टी ने पूरे महाराष्ट्र में 399 वार्ड जीते और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।
मीरा-भायंदर और उल्हासनगर जैसे इलाकों में शिंदे गुट ने लगभग क्लीन स्वीप किया। मतदाताओं ने प्रतीकात्मक राजनीति की बजाय बुनियादी ढांचे और कामकाज को तरजीह दी। कुल मिलाकर महायुति ने राज्यभर में 2869 में से 1991 वार्ड जीत लिए। अलग-अलग जगहों पर अलग चुनाव लड़ने के बावजूद मुंबई, नासिक और नागपुर में वोट ट्रांसफर साफ दिखाई दिया।
AIMIM ने इन चुनावों में सीमित लेकिन असरदार बढ़त दर्ज की। छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम में पार्टी ने 33 सीटें जीतीं, जो 2015 से ज्यादा हैं। पूरे महाराष्ट्र में AIMIM को 126 वार्ड मिले। पार्टी ने मालेगांव, नांदेड़ वाघाला, अमरावती, धुले, सोलापुर, मुंबई और नागपुर जैसे शहरों में भी सीटें जीतीं। हालांकि संख्या कम है, लेकिन AIMIM की मौजूदगी ने विपक्षी वोटों को बांटने का काम किया।
इसका सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को हुआ। इस चुनाव का एक अनोखा पहलू तमिलनाडु बीजेपी नेता के. अन्नामलाई रहे, जो खुद चुनाव नहीं लड़े लेकिन चर्चा में रहे। मुंबई को अंतरराष्ट्रीय शहर बताने वाले उनके बयान पर राज ठाकरे ने उन्हें \“रसमलाई\“कहकर तंज कसा था।
चुनाव नतीजों के बाद महायुति की जीत के साथ सोशल मीडिया पर बीजेपी समर्थकों ने इसी \“रसमलाई\“ बयान को पलटवार के तौर पर इस्तेमाल किया। यह दिखाता है कि चुनाव में सिर्फ सीटें ही नहीं, बल्कि नैरेटिव भी मायने रखता है।
हारने वाली टीम
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को सबसे बड़ा नुकसान हुआ। 2017 में 130 से ज्यादा सीटों वाली पार्टी इस बार बीएमसी में सिर्फ 65 सीटों पर सिमट गई। गोराई और माहिम जैसे पारंपरिक गढ़ भी हाथ से निकल गए। राज्यभर में पार्टी को सिर्फ 155 वार्ड मिले।
कांग्रेस की हालत भी कमजोर रही। बीएमसी में पार्टी को 24 सीटें मिलीं और पूरे राज्य में करीब 324 वार्ड। पुणे जैसे शहर में कांग्रेस पांच से भी कम सीटों पर सिमट गई। कमजोर अभियान, अंदरूनी कलह और नेतृत्व की कमी इसकी बड़ी वजह मानी गई।
राज ठाकरे की एमएनएस का \“मराठीमानूस\“ वाला एजेंडा भी असर नहीं दिखा सका। मुंबई में पार्टी सिर्फ 6 वार्ड जीत पाई और पूरे राज्य में 13 वार्डों तक सिमट गई। शरद पवार गुट की एनसीपी को भी बड़ा झटका लगा। मुंबई में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली और पुणे जैसे मजबूत माने जाने वाले इलाकों में भी असर नहीं दिखा। पूरे राज्य में गुट को सिर्फ 36 वार्ड मिले।
अजित पवार, जो महायुति का हिस्सा हैं उन्हें भी नुकसान हुआ। चुनाव के दौरान अपने ही सहयोगियों पर हमले और बाद में शरद पवार के साथ गठबंधन की रणनीति काम नहीं आई। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे गढ़ बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत लिए।
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