जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने शनिवार को आप नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की वर्ष 2020 विधानसभा चुनाव जीत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिका में कोई ठोस सुबूत या वैधानिक कारण नहीं है, जो इसे स्वीकार्य बना सके। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने कहा कि चुनावी परिणाम में हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत ही किया जा सकता है।
अवैध प्रचार के आरोप भी खारिज
अदालत ने कहा कि याचिका केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों पर आधारित थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव को चुनौती देने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि गैरकानूनी गतिविधि ने चुनाव परिणाम को सामग्रीगत रूप से प्रभावित किया, जो इस मामले में पूरी तरह से गायब था।अदालत ने अवैध प्रचार के आरोप को भी खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि याचिका में प्रस्तुत फोटो केवल पार्टी के साधारण होर्डिंग्स दिखाते थे, जिनमें सिसोदिया का कोई उल्लेख नहीं था। सिसोदिया द्वारा प्राथमिकी छिपाने के आरोप को भी अदालत ने खारिज किया। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने यह तक नहीं बताया कि सिसोदिया को उस समय प्राथमिकी की जानकारी थी या नहीं। अदालत ने कहा कि याचिका आवश्यक कानूनी मानदंडों को पूरा नहीं करती है।
नामांकन पत्र में आपराधिक पृष्ठभूमि को छुपाया
याचिका सिसोदिया से हारने वाले प्रतिद्वंद्वी प्रताप चंद्रा ने दायर की थी, जिन्होंने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केवल 95 वोट हासिल किए थे। याचिका में आरोप लगाया गया था कि सिसोदिया ने आचार संहिता के दौरान धारा 126 (चुनाव प्रचार पर रोक लगाती है, खासकर मतदान समाप्त होने से 48 घंटे पहले के दौरान, जिसमें टेलीविजन या अन्य माध्यमों से चुनावी मामलों के प्रदर्शन, सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध शामिल है) का उल्लंघन किया और अपने नामांकन पत्र में आपराधिक पृष्ठभूमि को छुपाया।
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