लालू प्रसाद यादव।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। भूमि के बदले नौकरी घोटाला मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा की गई प्राथमिकी को रद करने की मांग वाली पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि अदालत अपना निर्णय सुनाएगी।
इस दौरान लालू यादव की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) की तरफ से पेश हुए एडिशनल सालिसिटर जनरल (एएसजी) एस वी राजू के बीच तीखी बहस हुई। लालू यादव ने प्राथमिकी रद करने के साथ-साथ 2022, 2023 और 2024 में दायर तीन आरोप पत्र और उसके बाद के संज्ञान आदेशों को रद करने की भी मांग की है।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अभियोजन के लिए मंज़ूरी की जरूरत पर बहस करते हुए कहा कि जांच एजेंसी को मंजूरी लेनी होगी और क्लोजर रिपोर्ट सीबीआई ने खुद फाइल की थी। एएसजी ने कपिल सिब्बल की दलीलों पर आपत्ति जताई और उन पर नए मुद्दे उठाने और कानून को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि सिब्बल गुमराह करने वाली दलीलें देते हैं और बहस नहीं करने देते।
एएसजी के आरोपितों को बेबुनियाद बताते हुए सिब्बल ने एएसजी में इतनी भी ईमानदारी नहीं है कि वह यह कह सकें कि मैंने किसी कोर्ट को गुमराह नहीं किया है। अपनी जिंदगी में कभी नहीं। सिब्बल ने यहां तक कहा कि आप भारत के एएसजी हो सकते हैं, लेकिन आप जज नहीं हैं।
हालांकि, अपनी बात पर कायम रहते हुए एएसजी ने कहा कि अदालत के सामने कानूनी स्थिति साफ करना उनका फर्ज है। दोनों के बीच जिरह तेज होने पर अदालत ने बीचबचाव किया और दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
यह मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर में इंडियन रेलवे के वेस्ट सेंट्रल जोन में ग्रुप डी की नियुक्तियों से जुड़ा है। यह नियुक्ति 2004 से 2009 के बीच लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान की गई थी। इसके बदले लालू परिवार या सहयोगियों के नाम पर भर्ती हुए लोगों द्वारा तोहफे में दी गई या स्थानांतरित की गई जमीन के टुकड़ों के बदले में की गई थीं।
18 मई 2022 को लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी, दो बेटियों, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी लोगों सहित अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया था। याचिका में कहा गया कि प्राथमिकी 2022 में दर्ज की गई थी, जबकि सीबीआई की शुरुआती पूछताछ और जांच सक्षम कोर्ट के सामने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बाद बंद कर दी गई थी। पिछली जांच और उसकी क्लोजर रिपोर्ट को छिपाकर नई जांच शुरू करना कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है।
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