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टैक्स संग्रह की बढ़ोतरी दर कम होने से राजस्व के मोर्चे पर चुनौती (फाइल फोटो)
राजीव कुमार, नई दिल्ली। यूं तो पिछले साल ही केंद्र सरकार ने बजट में 12 लाख रुपये तक की आय को कर मुक्त करने की घोषणा कर दी थी और उसके बाद जीएसटी सुधारों ने जनता पर पड़ने वाली महंगाई की मार को भी कर दिया।
इस वजह से सरकार के राजस्व पर साफ असर देखा जा रहा है। लेकिन अभी भी 5-7 लाख रुपये कमाने वाले निम्न मध्यम आय वर्ग के लिए ऐसी राहत की दरकार मानी जा रही है जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ सके जो अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद हो। यानी ऐसी राहत जिससे व ह किफायती मकान खरीद सकें और जीवन स्तर पर बदलाव ला सकें।
जानकर मानते हैं कि शहर में रहने वाले ये निम्न मध्यम वर्ग सबसे अधिक आकांक्षी है और इन्हें मकान खरीदारी में ब्याज दरों पर अतिरिक्त छूट या सरकार की तरफ से एक निश्चित किस्त पर मकान की सुविधा, इलाज के लिए सब्सडी वाले हेल्थ इंश्योरेंस और रेल, बस व मेट्रो में सवारी के लिए कम दर पर सालाना एकमुश्त भुगतान की सुविधा मुहैया कराई जाए तो खपत बढ़ने से अर्थव्यवस्था को भी समर्थन मिलेगा।
किन चीजों पर देना होगा ध्यान?
पर इसके साथ ही राजस्व बढ़ोत्तरी के लिए विनिवेश और मौद्रीकरण पर ध्यान देना होगा। डेलायट के पार्टनर ( अप्रत्यक्ष कर) एम.एस. मणि कहते हैं, \“फरवरी में पेश होने वाले बजट का फोकस उपभोग बढ़ाने पर होना चाहिए ताकि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में मदद मिले और उससे टैक्स का संग्रह बढ़ सके।\“
लेकिन सरकार के सामने राजस्व की चुनौतियांचालू वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने इनकम टैक्स के साथ जीएसटी की दरों में भी कटौती कर राहत देने का काम तो किया, लेकिन इससे चालू वित्त वर्ष में टैक्स से मिलने वाले राजस्व की बढ़ोतरी दर प्रभावित हो गई। वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़ोतरी दर सात प्रतिशत से अधिक थी जो चालू वित्त वर्ष में चार प्रतिशत के पास है।
भारत में टैक्स संग्रह जीडीपी का लगभग सात प्रतिशत है जबकि चीन में यह प्रतिशत 20 तो वियतनाम में 16 प्रतिशत है। तभी बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सब्नवीस और एचडीएफसी बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता दोनों इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि वैश्विक उथल-पुथल और अमेरिकी टैक्स की वजह से कारपोरेट के मार्जिन पर दबाव है।
इनकम टैक्स छूट की सीमा 12 लाख करने से लगभग एक करोड़ टैक्सपेयर्स इस दायरे से बाहर चले गए। जानकारों का कहना है कि जीएसटी कम करने से बढ़ने वाली खपत से टैक्स संग्रह तो बढ़ेगा, लेकिन इसमें छह माह का समय लगेगा।फिर कहां से पैसा आएगा सामाजिक भलाई पर खर्च के लिएऐसे में सवाल उठता है कि सरकार अपने राजस्व को कैसे बढ़ाएगी।
पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल किया नहीं जा सकता है। राजनीति इतनी तीखी चल रही है कि कोई भी सरकार या दल कृषि से होने वाली इनकम को टैक्स के दायरे में नहीं लाएगी। हालांकि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के प्रेसिडेंट चरनजोत सिंह नंदा कहते हैं, \“20 एकड़ से अधिक जमीन पर खेती करने वालों को टैक्स के दायरे में लाया जाना चाहिए, हमने सरकार से यह सिफारिश की है।
\“चरनजोत का सुझाव बहुत व्यावहारिक है क्योंकि साम्नायतया 20 एकड़ की कृषि भूमि का मालिक उच्च मध्यमवर्ग में शामिल होता है। पर राजनीतिक कारणों से यह संभव नहीं है। टैक्स बढ़ाने के लिए विनिवेश और संपदा के मौद्रीकरण (मोनेटाइजेशन) का रास्ता मुख्य रूप से दिखता है।
बढ़ेगी सीमा?
हालांकि पिछले तीन साल से इस दिशा में सरकार को कुछ खास सफलता हाथ नहीं लगी है। वहीं, सब्सिडी के मद में सालाना 4.5 लाख करोड़ के खर्च की भी समीक्षा की जा सकती है। मदन सब्नविस कहते हैं, “विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते के तहत सरकार को इस साल आयात शुल्क में कटौती करनी होगी, इसलिए टैक्स के फ्रंट पर तो बजट में राहत मुश्किल है, खाद के मद की 1.7 लाख करोड़ की सब्सिडी में राहत देखने को मिल सकती है।
मुफ्त के राशन की स्कीम में भी कोई बदलाव नहीं होगा। विनिवेश की जगह सरकार का मुख्य फोकस संपदा के मौद्रीकरण पर रहेगा।“क्या-क्या उम्मीद है बजट में आईसीएआई के प्रसिडेंट चरनजोत सिंह नंदा कहते हैं, \“50 लाख की आय से सरकार का सरचार्ज शुरू हो जाता है।
इस सीमा को बढ़ाकर 75 लाख किया जाना चाहिए। अभी 50 लाख से एक करोड़ की आय पर 10 प्रतिशत का सरचार्ज लगता है। टीडीएस नहीं देने और इनकम टैक्स नोटिस का जवाब नहीं देने पर उसे अपराध नहीं माना नहीं जाना चाहिए।\“
एचडीएफसी की प्रमुख अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता क हती है , \“वित्तीय मजबूती के लिए बजट में सरकार का फोकस निश्चित रूप से विनिवेश और संपदा के मौद्रीकरण पर होगा। अगले वित्त वर्ष में नामिनल जीडीपी की विकास दर अधिक होने से टैक्स संग्रह बढ़ाने में मदद मिलेगी।\“
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