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भिवानी नागरिक अस्पताल की बड़ी लापरवाही, स्टॉक होने के बावजूद क्यों एंटी-रेबीज वैक्सीन को तरस रहे मरीज?

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सरकारी स्टॉक के बावजूद बाहर से मंगवानी पड़ रही एंटी रेबीज वैक्सीन (प्रतीकात्मक फोटो)



नवनीत शर्मा, भिवानी। जिला नागरिक अस्पताल के आपातकालीन विभाग में एक बार फिर व्यवस्थागत खामियों को लेकर चर्चा में है। अस्पताल ने जिला मुख्यालय स्थित ड्रग हाउस से एंटी रैबीज टीकों का नियमित उठान नहीं किया है, जबकि नियमों के मुताबिक आपातकालीन विभाग में कम से कम चार माह का एडवांस स्टाक उपलब्ध होना चाहिए। विडंबना यह है कि प्रशासनिक स्तर पर हजारों इंजेक्शन उपलब्ध होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में मरीजों को बाजार से महंगे दामों पर टीके खरीदने पड़ रहे हैं।

अस्पताल प्रशासन ने करीब 30 हजार एंटी रेबीज इंजेक्शन के स्टाक का दावा किया गया है, परंतु रोजाना आने वाले मरीजों के अनुभव इस दावे से मेल नहीं खाते। कुत्ते और बंदर के काटने के मामलों में पीड़ितों को अक्सर प्राइवेट मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन लाने की सलाह दी जाती है। कई मरीजों ने बताया कि उन्हें 1970 रुपए तक खर्च कर चार इंजेक्शन की किट खरीदनी पड़ी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि भारी पड़ रही है।

जिला नागरिक अस्पताल के आपातकालीन विभाग में बुधवार सुबह करीब आठ बजे बैंक कालोनी निवासी एक व्यक्ति अपनी भतीजी को एंटी रैबीज इंजेक्शन करवाने आया था। लेकिन स्टाफ ने कहा कि उनके पास इंजेक्शन की डोज नहीं है। अगर इंजेक्शन लगवाना है तो बाहर मेडिकल स्टोर से ले आए। मरीज के स्वजन 1970 रुपये में इंजेक्शन डोज की कीट लेकर आए। इसके अलावा एक युवक को कुत्ते ने काट रखा था, जिसके पास डोज के रुपये नहीं होने के कारण बिना इंजेक्शन लगवाएं ही वापस घर चला गया।

स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब कुछ मरीज उपचार अधूरा छोड़ देते हैं। कई लोग केवल एक डोज ली जिसकी कीमत लगभग 350 रुपए बताई जा रही है। वे सिर्फ एक डोज लगवाकर आगे के टीके नहीं लेते। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है। रेबीज संक्रमण से बचाव के लिए निर्धारित सभी डोज समय पर लेना अनिवार्य होता है। अधूरा उपचार संक्रमण के जोखिम को गंभीर रूप से बढ़ा देता है।

मरीजों और स्वजनों का आरोप है कि आपातकालीन विभाग में तैनात कुछ कर्मियों की लापरवाही के कारण उन्हें समुचित जानकारी और सुविधा नहीं मिलती। कई बार स्पष्ट मार्गदर्शन के अभाव में मरीज बिना टीका लगवाए ही घर लौट जाते हैं, जिससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। सामाजिक संगठनों ने इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है।

रैबीज एक घातक वायरल संक्रमण है, जो संक्रमित जानवर के काटने या खरोंच से फैलता है। एक बार इसके लक्षण विकसित हो जाने पर यह लगभग असाध्य माना जाता है और अधिकांश मामलों में मृत्यु का कारण बनता है। रैबीज का वायरस सीधे तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, जिससे मरीज में बेचैनी, बुखार, निगलने में कठिनाई, पानी से डर (हाइड्रोफोबिया), मांसपेशियों में ऐंठन और अंततः कोमा जैसी गंभीर स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
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बचाव के जरूरी उपाय:
चिकित्सकों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को कुत्ते, बंदर या किसी अन्य संदिग्ध जानवर ने काटा हो, तो सबसे पहले घाव को कम से कम 10-15 मिनट तक साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद तुरंत नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में जाकर एंटी रेबीज वैक्सीन लगवानी चाहिए। गंभीर मामलों (कैटेगरी III) में रेबीज इम्युनोग्लोब्युलिन देना भी जरूरी हो सकता है। टीकाकरण का पूरा कोर्स पूरा करना अत्यंत आवश्यक है।
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वर्जन:
यह मामला संज्ञान में आते ही प्रधान चिकित्सा अधिकारी को ड्रग वेयरहाउस से एंटी रेबीन वैक्सीन का स्टाक लेने को कह दिया है। आपातकालीन विभाग में चार माह का स्टाक एडवांस होना अनिवार्य होता है। यह लापरवाही है इस मामले की जांच के निर्देश भी दिए है। अस्पताल में किसी भी मरीज को अनावश्यक परेशानी नहीं होने दी जाएगी।
- डा. रघुवीर शांडिल्य, सिविल सर्जन।
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