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स्क्रीन की गिरफ्त में बचपन: डिजिटल दुनिया का शोर और बच्चों की खामोशी, कौन है जिम्मेदार?

Chikheang 1 hour(s) ago views 77
  

दिल्ली-एनसीआर में बच्चों में बढ़ती मोबाइल लत और अभिभावकों की अनदेखी पर यह लेख केंद्रित है। जागरण ग्राफिक्स  



जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। क्या आप बच्चे पर उस समय ध्यान दे पाते हैं, जब वो अपने सामान्य व्यवहार से अलग दिख रहा होता है, कुछ विपरीत गतिविधि कर रहा होता है, या गुमसुम रहता है और खुद को अकेला ही रखना चाहता है? नहीं न, कई बार समय न होने की आड़ में या उस व्यवहार को हम सामान्य ही मानकर उसकी अनदेखी कर देते हैं यही अनदेखी उस बच्चे के मन के लिए भटकाव के दरवाजे खोल देती है। और बाद में माता-पिता के लिए पश्चाताप ही रहता है।

गाजियाबाद में हाल ही में तीन नाबालिग बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। इसके पीछे मोबाइल की लत, कोरियन कल्चर का हावी होने जैसे कारण तो सामने उभर कर आए लेकिन वो बच्चियां मोबाइल और किसी दूसरे देश की संस्कृति के जाल से इतनी जकड़ी ही क्यों, इसके पीछे कहीं न कहीं उस परिवार की विफलता के ही अधिक संकेत मिलते हैं। जहां बच्चियों को न स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था न बाहर की दुनिया देखने-समझने के लिए।

  

दिल्ली समेत एनसीआर में बच्चों का असामान्य व्यवहार और बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों व किशोरवय लड़के-लड़कियों के चिड़चिड़ा होने, माता-पिता से झगड़ने, स्कूल व ट्यूशन न जाने और अभिभावकों के सख्ती बरतने पर आत्महत्या तक कर लेने के मामले अब धीरे-धीरे आम होते जा रहे हैं। ऐसे में यही सवाल उठता है कि आखिर घर से स्कूल तक बच्चों को कैसे सही समय पर सही दिशा में परवरिश मिले? कैसे उन्हें डिजिटल स्क्रीन का आदी होने से रोका जाए? इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है :

क्या आप मानते हैं कि दिल्ली समेत एनसीआर में बच्चों के मोबाइल का लती होने की मुख्य वजह अभिभावकों का उनपर ध्यान न देना है?

हां : 99

नहीं : 1

क्या दिल्ली समेत एनसीआर में बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखने के लिए स्कूलों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी ?

हां : 97

नहीं : 3
बच्चों से संवादहीनता उनको लेकर जा रही मोबाइल के करीब

पहले हम मर्ज बढ़ाते हैं और जब उसके परिणाम सामने आते हैं तो उस पर हैरत जताते हैं। कोई भी बच्चा अपनी उम्र के हर पड़ाव पर स्वजन के ही संरक्षण में सर्वाधिक होता है। या स्कूल के। अब परवरिश और शिक्षा के इन दोनों ही स्थानों पर उन्हें कैसा माहौल मिल रहा है, उसी से उसका आज कल और भविष्य तय होता है। दिल्ली सहित एनसीआर जैसे शहरों में परिवारों की जीवन-शैली बहुत प्रभावित हुई है।

  

बढ़ते एकल परिवार, फ्लैटों में सीमित होता सामाजिक दायरा, माता-पिता का नौकरी पेशा होने की वजह से नियमित समय न दे पाना, परिवार के रिश्तों में भावनात्मक लगाव की कमी हमारे बच्चों को प्रभावित कर रही है। वर्किंग माता-पिता कभी सुविधा के नाम पर, कभी सुरक्षा के नाम पर, कभी व्यस्तता के विकल्प के रूप में मोबाइल फोन बच्चों के हाथ में सौंप देते है, धीरे-धीरे यही उनके रिश्तों पर हावी हो जाता है।

मोबाइल फोन के खेलों की काल्पनिक दुनिया उन्हें अपनी लगने लगती है। जब तक अभिभावकों को इसका अहसास होता है, वो रोक लगाने की कोशिश करते हैं तब तक देर हो चुकी होती है। इस सारे प्रकरण का बच्चा अकेला दोषी नहीं होता, विडंबना यह है कि उस कम उम्र के बच्चे की परेशानियों को हम गंभीरता से लेते ही नहीं है।

आक्रामक व्यवहार, चिड़चिड़ाहट, उनकी चुप्पी व संवादहीनता को उनकी जिद या उम्र कहकर टाल जाते हैं। हम भारतीय परिवार अभी भी बहुत सारे विषयों पर बात करने में संकोच के दायरे में बंधे हैं। केवल सख्त अनुशासन से ही उनका समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं, जो हर बार सफलता की कहानी नहीं बनता है।

आज के युग में माता-पिता की सख्ती ही केवल एकमात्र समाधान नहीं है। महत्वपूर्ण संबल, साधन तो संवाद ही है, बातचीत- जिसके जरिए बच्चे के मन की भावनाएं, मन में चलने वाली वैचारिक उथल-पुथल, उनके सामने आ रही चुनौतियों को जानने समझने की जरूरत होती है।

सही-गलत के बारे में समझाना, अच्छे-बुरे का अंतर बताना, मोबाइल फोन के उपयोग की स्पष्टता, व्यावहारिक सीमाएं सामान्य बातचीत के जरिए और सहमति के साथ समझाने की आवश्यकता है। आप कितने भी व्यस्त हैं, लेकिन भोजन की मेज पर, सोने से पहले, पढ़ाई में आई छोटी-छोटी अड़चनों पर बात करते हुए दिया गया नैतिक ज्ञान, प्रेरक कहानियां बच्चों के जेहन में हमेशा के लिए छप जाती हैं। और उनकी उलझनों के लिए मानसिक थेरेपी का भी काम करती हैं।

स्कूलों की भी अहम भूमिका होती है। स्कूल केवल अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न रहकर नैतिक ज्ञान की शिक्षा, मानसिक व भावनात्मक स्तर पर उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखें, नियमित जागरूकता सत्र कराएं, काउंसलिंग सत्र में बच्चे की बात सुनी जाए, हर बच्चे की मनोदशा अलग होती है। स्वजन से भी उसी अनुसार संवाद किया जाए। साथ ही स्कूल में विभिन्न प्रकार की गतिविधि कला, संगीत, खेल व सामूहिक गतिविधियां बढ़ाई जाएं ताकि उनका स्क्रीन टाइम सीमित रहे।

एक शिक्षाविद होने के नाते मैं कहना चाहूंगी कि मोबाइल फोन कोमल उम्र में, बिना मार्गदर्शन और संतुलन के बच्चे के जीवन के खालीपन को भर तो सकता पर उसके घातक परिणाम हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, समाज व स्कूल मिलकर बच्चों को ऐसा सुरक्षित वातावरण दें, जहां वे अपने मन की बात बिना डरे कह सकें, किसी भी चुनौती के समय उन्हें विश्वास हो कि उनके अपने उनके साथ हैं।

-मंजुला सिंह, प्रधानाचार्या, नेहरु वर्ल्ड स्कूल, गाजियाबाद ने जैसा आदित्य त्रिपाठी को बातचीत में बताया
साथ-संवाद-लगाव ही स्क्रीन लत से बचाने की दवा

चिकित्सकीय अनुभव के आधार पर एक बहुत अहम तथ्य के साथ अपनी बात की शुरुआत करना चाहूंगा, जहां बच्चे सुने जाते हैं, समझे जाते हैं और भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं, वहां उन्हें स्क्रीन में शरण लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस बात में हर अभिभावक के लिए बहुत अहम संदेश है। दरअसल मोबाइल की लत बच्चों की नहीं, ये तो उनके आसपास के वयस्क संसार की विफलताओं का संकेत है। जहां संवाद सिकुड़ता है, अपेक्षाओं में गुब्बारे की तरह हवा भर रही होती है और समय तो जैसे सबसे दुर्लभ संसाधन बन चुका होता है।

डिजिटल व्यवस्था में मोबाइल फोन आज एक आवश्यक उपकरण है, लेकिन बच्चों और किशोरों के लिए इसका अनियंत्रित उपयोग एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद जैसे महानगरीय क्षेत्रों में, जहां तकनीक की पहुंच आसान है और जीवन की गति तेज, वहां बच्चों में मोबाइल फोन पर अत्यधिक निर्भरता तेजी से बढ़ रही है। इन क्षेत्रों में बच्चों की दिनचर्या अत्यधिक संरचित और दबावपूर्ण हो गई है। स्कूल, होमवर्क, कोचिंग और निरंतर प्रतिस्पर्धा के बीच बच्चों के पास ‘भावनात्मक विश्राम’ बहुत सीमित हो चुका है। मोबाइल फोन उनके लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह जाता, वो तो तनाव से बचने और अकेलेपन से निपटने का माध्यम बन जाता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मोबाइल फोन की लत एक व्यावहारिक लत है, जो मस्तिष्क के डोपामिन तंत्र को प्रभावित करती है। लगातार बदलता कंटेंट, गेमिंग रिवार्ड और इंटरनेट मीडिया पर मिलने वाली त्वरित प्रतिक्रियाएं मस्तिष्क को तुरंत संतुष्टि का आदी बना देती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चा वास्तविक जीवन की गतिविधियों पढ़ाई, खेल, पारिवारिक संवाद और सामाजिक संपर्क से धीरे-धीरे दूर होता चला जाता है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर एकाग्रता में कमी, नींद संबंधी विकार, चिंता और अवसाद जैसे लक्षण स्पष्ट रूप से सामने आने लगते हैं।

क्लिनिकल अनुभव यह भी दर्शाता है कि जिन बच्चों में मोबाइल फोन अचानक छीने जाने पर तीव्र आक्रामकता, घबराहट या बेचैनी दिखाई देती है, वे वास्तव में मोबाइल से नहीं, बल्कि उस भावनात्मक सहारे से वंचित हो रहे होते हैं, जिसे उन्होंने स्क्रीन के भीतर खोज लिया था। यह स्थिति विशेष रूप से तब खतरनाक हो जाती है, जब बच्चा पहले से ही सामाजिक दबाव, अकेलेपन या असफलता की भावना से जूझ रहा हो। ऐसे मामलों में आत्म नुकसान से जुड़े विचारों का खतरा भी बढ़ जाता है, जिसे किसी भी स्तर पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मोबाइल फोन के शारीरिक प्रभाव भी मानसिक स्वास्थ्य को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। अत्यधिक स्क्रीन-टाइम से आंखों की समस्याएं, नींद में व्यवधान और शारीरिक निष्क्रियता बढ़ती है। नींद की कमी और लगातार थकान बच्चों की भावनात्मक सहनशीलता को कम कर देती है, जिससे वे अधिक चिड़चिड़े, अस्थिर और आवेगी हो जाते हैं। इस प्रकार मानसिक और शारीरिक समस्याएं एक-दूसरे को लगातार बढ़ाने वाला दुष्चक्र बना लेती हैं।

इस समस्या की रोकथाम केवल परिवार तक सीमित नहीं हो सकती। स्कूलों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोबाइल फोन को केवल अनुशासन या प्रतिबंध के चश्मे से देखना समस्या को और जटिल बना देता है। स्कूलों को यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल लत एक मानसिक स्वास्थ्य विषय है, न कि केवल नियम उल्लंघन का मामला। जिन शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापकों की ओर से नियमित काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, डिजिटल व्यवहार पर खुला संवाद और अभिभावकों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित किया गया है, वहां बच्चों में मोबाइल पर निर्भरता कम होते हुए देखी गई है।

परिवार स्तर पर अभिभावकों को बच्चों के डिजिटल व्यवहार में सक्रिय और जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। स्क्रीन-टाइम की स्पष्ट सीमाएं तय करना, स्वयं मोबाइल उपयोग में संयम बरतना और बच्चों के साथ नियमित, संवेदनशील संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। अपनी अंतिम बात भी शुरू में कही बात के भाव से ही कहूंगा कि बच्चों को डिजिटल अनुशासन से पहले मानवीय जुड़ाव, भावनात्मक सुरक्षा और संवाद की आवश्यकता है और यही इस बढ़ते संकट से निकलने का सबसे प्रभावी और जिम्मेदार रास्ता भी।

-डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा, बाल मनोरोग विशेषज्ञ, बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली ने जैसा कि अनूप कुमार सिंह को बातचीत में बताया
बच्चों में मोबाइल फोन की लत के प्रमुख व्यवहार और मनोवैज्ञानिक कारण

  • आचार विचार, परिवारिक और सामाजिक कारण।
  • वास्तविक जीवन के तनाव से बचने के लिए डिजिटल दुनिया में संतुष्टि तलाशना।
  • अभिभावकों द्वारा सुविधा के लिए फोन देना।
  • घर में मोबाइल का अनुचित या निरंतर उपयोग माडल के रूप में दिखना।
  • माता-पिता की व्यस्तता, निगरानी की कमी।
  • मनोरंजन और गेमिंग से परिणाम से तुरंत संतुष्टि।
  • इंटरनेट मीडिया पर लाइक्स और चैट से निरंतर जुड़ाव।
  • अनियंत्रित समय स्क्रीन पर, बगैर किसी समयसीमा के।
  • वीडियो गेम, रिवार्ड सिस्टम और इन-ऐप प्रोत्साहन।
  • नोटिफिकेशन और लगातार अलर्ट से ध्यानाकर्षण।
  • कोविड-19 का असर, महामारी के बाद स्कूल और सामाजिक इंटरेक्शन में कमी, इससे स्क्रीन-टाइम में वृद्धि।

शरीर व मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव

  • डिप्रेशन और चिंता के लक्षण : कई अध्ययनों में किशोरों में डिप्रेशन और चिंता के बढ़े मामलों का संबंध उच्च स्क्रीन-टाइम से जोड़ा गया है।
  • व्यावहारिक उतावलापन व चिड़चिड़ापन: मोबाइल के अनियंत्रित उपयोग से व्यावहारिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
  • एकाग्रता में कमी: पढ़ाई और कार्यों पर ध्यान कम होना और निरंतर विचलन।

शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • आंखों की समस्या (मायोपिया व नजर की कमजोरी):
  • बच्चों में नजर कमजोर होने की दर 20 वर्षों में लगभग तीन गुना बढ़ी।
  • नींद में खलल: स्क्रीन की नीली रोशनी नींद के चक्र को प्रभावित करती है।
  • सिर दर्द, गर्दन और पीठ में दर्द: लंबे समय तक फोन पकड़ने से शारीरिक दर्द।
  • बॉडी एक्टिविटी की कमी: मोबाइल पर समय व्यतीत करने से शारीरिक गतिविधियां घटती हैं।

सामाजिक व भावनात्मक प्रभाव

  • परिवार और वास्तविक सामाजिक संपर्क से दूरी।
  • आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास में गिरावट।

खतरनाक एप और गेम: बच्चों के लिए कौन ज्यादा खतरनाक

  • ऐसे इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म जिनमें लगातार नोटिफिकेशंस और लाइक्स तथा इंप्रेशन सिस्टम हो।
  • ऐसे गेम व ऐप जिनमें इन-ऐप खरीद, रिवार्ड सिस्टम, एडिक्टिव स्टोरी व वीडियो शामिल हैं।
  • इन सभी प्रकार के गेम व ऐप बच्चों के मनोविज्ञान और समय प्रबंधन को प्रभावित करते हैं।
  • किसी भी ऐप को बच्चों के लिए सुरक्षित मानने से पहले हमेशा स्क्रीन-टाइम लिमिट, निगरानी उपकरण और माता-पिता नियंत्रण होना चाहिए।
  • 33.1% किशोरों में डिप्रेशन के लक्षण
  • 24.9% में चिंता के लक्षण
  • 56% में उतावलापन तथा चिड़चिड़ापन।
  • 33% किशोर दिल्ली में मोबाइल की लत के शिकार हैं।


नोट : मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग रिपोर्ट, देशभर की केस स्टडी के आधार पर(एम्स, दिल्ली)
पूर्व में हई घटनाएं

  • 31 जुलाई, 2025 : दिल्ली के नांगलोई में एक 10 वर्ष के बच्चे ने अपने घर में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले वह 11 घंटे तक मोबाइल पर सक्रिय था। सात घंटे उसने फ्री फायर गेम खेला था और चार घंटे तक यह यूट्यूब देख रहा था।
  • 25 अक्टूबर : उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली के आदर्श नगर में मोबाइल गेम खेलने से बहन ने रोका तो 15 साल के नाबालिग ने खुदकुशी कर ली।


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