वंदे मातरम की नई गाइडलाइन के विरोध में उतरे मुस्लिम संगठन। फोटो: आर्काइव
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राष्ट्रगीत वंदे मातरम पर गृह मंत्रालय के नए दिशानिर्देश मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और जमीयत उलेमा -ए- हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों को रास नहीं आए। इसे इस्लामिक मान्यताओं के विरुद्ध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
गृह मंत्रालय ने बुधवार को जारी निर्देश में कहा है कि राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत को गाया या बजाया जाए तो उसमें सबसे पहले राष्ट्रगीत बजाया जाए और तीन मिनट 10 सेकेंड की अवधि वाले छह अंतरे गाए जाएं।
एआईएमपीएलबी के महासचिव मौलाना मो. फजलुर रहीम मुजदि्ददी ने कहा कि यह आदेश गैरकानूनी और धार्मिक आजादी के खिलाफ है, जो मुसलमानों को बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। मौलाना ने कहा कि इस गीत में दुर्गा और दूसरे देवी-देवताओं की पूजा और आदर का जिक्र है, जो सीधे तौर पर उनके विश्वास के खिलाफ है।
एक मुसलमान सिर्फ एक ईश्वर, अल्लाह की पूजा करता है। वहीं, जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने निर्णय को अत्यंत दुखद तथा नागरिकों पर जबरन थोपा गया निर्णय बताते हुए कहा कि यह पक्षपातपूर्ण फैसला है जो नागरिकों की उस धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरी चोट करने का प्रयास है, जिसे संविधान ने प्रदान की है।
मौलाना मदनी ने कहा कि वंदे मातरम् का विवाद बहुत पुराना है। तब भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया था। हमें किसी के वंदे मातरम् गाने या किसी समारोह में इसकी धुन बजाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते, क्योंकि हम केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं और अपनी इस इबादत में किसी और को शामिल नहीं कर सकते है।
यह भी पढ़ें- वंदे मातरम् को अनिवार्य करने के आदेश पर मौलाना अरशद मदनी बोले- यह धार्मिक स्वतंत्रता का हनन |