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प्रतीकात्मक चित्र
जागरण संवाददाता, रामपुर। हत्या के आरोप से एक ही परिवार के चार लोगों को न्यायालय से राहत मिल गई। चारों पर हत्या का आरोप साबित नहीं हो सका, जिसके कारण फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चारों को बरी कर दिया। इनमें दंपती, उनका बेटा और दामाद शामिल हैं।
हत्या की वारदात तीन साल पहले केमरी थाना क्षेत्र में हुई थी। ग्राम जिवाई जदीद निवासी मुकेश कुमार ने केमरी थाने में तहरीर दी थी, जिसमें कहा था कि उनका बेटा 22 वर्षीय यश कुमार सिंह गदरपुर उत्तराखंड के काम करता था। वह घटना की शाम घर आया था।
गांव के ही जगवीर सिंह और उसके परिवार के लोगों ने मिलकर बेटे पर लाेहे की राड, तलवार, फरसा, ईंट पत्थर से हमला कर मौत के घाट उतार दिया था। पुलिस ने इस हत्या के आरोप में जगवीर सिंह, उनकी पत्नी स्नेहा उर्फ शशि, तीन बेटों सुधीर सिंह, धीरेंद्र, रुपेंद्र और दामाद रिंकू निवासी नवाबगंज थाना पटवाई को नामजद किया था।
पुलिस ने विवेचना के दौरान धीरेंद्र और रुपेंद्र के नाम प्राथमिकी से निकाल दिए थे। पुलिस ने तीन माह में जांच पूरी कर बाकी चारों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था। न्यायालय में सुनवाई के दौरान अभियोजन ने घटना के समर्थन में 11 गवाह और कई साक्ष्य पेश किए।
अभियोजन का कहना था कि गवाहों और साक्ष्यो ने घटना को साबित किया है। अभियुक्तों को कड़ी सजा दी जाए। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता गौरव सिंह सैनी ने पैरवी की। उनका कहना था कि मृतक पक्ष की अभियुक्तों से रंजिश चल रही है। युवक की मौत मारपीट से नहीं, बल्कि हादसे से हुई थी। उसकी बाइक खंभे से टकराई थी।
रंजिशन मृतक पक्ष ने झूठी प्राथमिकी दर्ज कराई थी। मृतक पक्ष ने अपने ही परिवार के सात लोगों की गवाही कराई, लेकिन गवाहों के बयानों में भिन्नता है। इससे घटना का समर्थन नहीं होता है। गवाहों द्वारा बताई गई मृतक के शरीर पर चोटें मेडिकल रिपोर्ट में साबित नहीं होती हैं।
गवाहों द्वारा तलवार, लोहे की राड, फरसा, ईंट पत्थर से काफी देर तक हमला करने का बयान दिया है, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर मात्र तीन चोटें आई हैं। बचाव पक्ष के अधिवक्ता का यह भी तर्क रहा कि अभियोजन के द्वारा जो आला कत्ल न्यायालय के समक्ष पेश किया गया, उसे जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला मुरादाबाद भेजा गया था।
उसकी जांच रिपोर्ट में मानव रक्त के संबंध में कोई भी स्पष्ट रिपोर्ट नहीं है और उक्त रिपोर्ट पर पाए गए रक्त की मृतक के रक्त से जांच भी नहीं की गई है। इससे यह स्पष्ट नहीं है कि आला कत्ल पर पाया गया रक्त मृतक का ही है। प्राथमिकी में मृतक पक्ष ने धीरेंद्र और रुपेंद्र के नाम भी दर्ज कराए थे।
पुलिस की विवेचना में दोनों घटना के समय हिमाचल प्रदेश और गुवाहटी में थे। घटना वादी मुकदमा के घर के पास हुई और घटना को घटित होते हुए पूरा परिवार देख रहा था। बावजूद इसके उसे बचाने कोई नहीं आया, जो कि विश्वास न किए जाने वाला तथ्य है और अभियोजन के कथानक को पूर्ण रूप से संदिग्ध बना देता है।
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