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फरीदाबाद में अनसेफ ब्लड से दो थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे हुए HIV संक्रमित, PMO के आदेश पर जांच शुरू

deltin33 1 hour(s) ago views 370
  

प्रतीकात्मक तस्वीर



जागरण संवाददाता, फरीदाबाद। अनसेफ ब्लड के कारण थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चों की जान खतरे में पड़ रही है। जिले में दो थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चों को रक्त चढ़ गया तो इससे वह एचआइवी संक्रमित हो गए। थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चों की मदद के लिए सक्रिय संस्था फाउंडेशन अगेंस्ट थैलेसीमिया के महासचिव रविंद्र डुडेजा ने बच्चों के एचआइवी ग्रस्त मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत की थी।

शिकायत मिलने पर प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश पर मामले की जांच शुरू कर दी गई है। सीडीएससीओ (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) तथा प्रदेश के औषधि नियंत्रण विभाग के अधिकारी मामले की जांच कर रहे हैं कि आखिर कमी कहां रही।

रविंद्र डुडेजा के अनुसार उनकी शिकायत अनसेफ ब्लड ट्रांसफ्यूमन को लेकर है। अब तक की जांच में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि विंडो पीरियड में किसी एचआईवी संक्रमित ने ब्लड बैंक में रक्तदान किया और यही रक्त जरूरतमंद थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चों को चढ़ा दिया गया।

एचआईवी संक्रमण के बाद की छह हफ्ते की उस समय अवधि को विंडो पीरियड कहा जाता है, जिसमें जांच के बाद भी रक्त में संक्रमण का पता नहीं चल पाता। यह स्थिति एलाइजा टेस्ट से सामने आती है। एलाइजा मशीन से किए गए टेस्ट में सिर्फ एंटी बाडी टेस्ट होता है।

फरीदाबाद और पलवल में 230 से अधिक थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे हैं। रविंद्र डुडेजा के अनुसार समय-समय पर नियमित अंतराल में इन बच्चों को ब्लड चढ़ाया जाता है। ब्लड की जांच एलाइजा टेस्ट की जगह नेट मशीन से होनी चाहिए। यह मशीन महंगी है।

इसलिए अस्पताल और ब्लड बैंक इसकी खरीदारी पर ध्यान नहीं देते। सभी ब्लड बैंकों में अनिवार्य रूप से अत्याधुनिक जांच प्रणाली (नेट टेस्ट सहित) लागू की जाए। रक्त की गुणवत्ता की नियमित और पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाए। दोषी पाए जाने वाले ब्लड बैंक प्रबंधन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ (एमडी बायो कैमिस्ट्री ) डॉ. जसवंत सिंह के अनुसार ब्लड टेस्ट की पद्धति में सुधार और बदलाव की जरूरत है। नेट टेस्टिंग अगर करते हैं तो रक्त में विषाणु का टेस्ट होता है। इस टेस्ट में तुरंत ही विषाणु का पता चल जाता है। जबकि एलाइजा एंटी बाडी टेस्ट होता है। एंटी बाडी बनने में छह हफ्ते लग जाते हैं। नेट टेस्टिंग हो ताे जोखिम का खतरा नहीं रहेगा।

उधर इस मामले में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी स्पष्ट कुछ भी नहीं कह रहे। वरिष्ठ औषधि नियंत्रण अधिकारी कृष्ण कुमार गर्ग ने बताया मामले की जांच अभी चल रही है। अधिक कुछ नहीं कह सकते। सीएमओ डॉ. जयंत आहूजा ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इतना ही कहा कि उनके यहां व्यवस्था ठीक है। बच्चों ने किसी दूसरे शहर में कहीं ब्लड चढ़वाया होगा।
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