आरबीआई का निर्देश - बैंकों को खत्म करने होंगे डार्क पैटर्न
नई दिल्ली। बीते सोमवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों द्वारा बीमा समेत अन्य फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स को गलत तरीके से बेचने पर कड़ा रुख अपनाते हुए बैंकों को अपने मुख्य कारोबार पर ध्यान को कहा था। अब इसी कड़ी में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बड़ा कदम उठाते हुए एक ड्राफ्ट निर्देश जारी किया है, जिसमें फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग और बिक्री पर कड़े नियम, बैंकों द्वारा उनकी बंडलिंग और डार्क पैटर्न (कस्टमर को ऐसे प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए उकसाना, जिनकी उन्हें जरूरत नहीं) पर रोक लगाने के अलावा कस्टमर की साफ सहमति जरूरी करने का प्रस्ताव रखा गया है।
जुलाई तक खत्म करने होंगे डार्क पैटर्न
‘रिस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडक्ट अमेंडमेंट डायरेक्शन्स, 2026’ नामक इस ड्राफ्ट के तहत सभी बैंकों के लिए जुलाई 2026 तक यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि उनके पास कोई डार्क पैटर्न न हो।
मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स के अनुसार, बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज में डार्क पैटर्न ऐसे UI/UX (यूजर इंटरफेस/यूजर एक्सपीरियंस) डिजाइन हैं जो यूजर्स को गुमराह करते हैं या उन्हें ऐसे काम करने के लिए उकसाते हैं जो वे नहीं करना चाहते - जैसे कि अनचाहे प्रोडक्ट खरीदना।
ये पैटर्न कंज्यूमर की आजादी और फैसले लेने की क्षमता को कम कर सकते हैं, जिससे गुमराह करने वाले विज्ञापन, गलत ट्रेड प्रैक्टिस या कंज्यूमर के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
ये होते हैं 8 तरीके डार्क पैटर्न
- लोकलसर्किल के अनुसार बहुत से ग्राहकों को जिन डार्क पैटर्न से दो-चार होना पड़ता है, उनमें पहला है बास्केट स्नीकिंग, यानी बिना बताए किसी सर्विस पर लास्ट समय एडिशनल चार्ज जोड़ देना शामिल है
- ग्राहकों को बार-बार किसी प्रोडक्ट्स को खरीदने के लिए उकसाया जाता है
- ऑनलाइन बैंकिंग प्लेटफॉर्म पर किसी अलग सर्विस के लिए जबरन साइन अप करना पड़ता है और किसी फीचर को एक्सेस करने के लिए एक्स्ट्रा पर्सनल जानकारी मांगी जाती है
- किसी चीज का सब्सक्रिप्शन देना और फिर उसे कैंसल करने के लिए ब्रांच बुलाकर समय बर्बाद करना
- कई ग्राहक ‘बेट एंड स्विच’ सिचुएशन का अनुभव करते हैं, जिसमें आखिर में दिया गया प्रोडक्ट या सर्विस, साइन-अप के समय असल में बताए गए या तय किए गए प्रोडक्ट या सर्विस से अलग होता है
- कई बार इंटरफेस पर रुकावट का सामना करना पड़ता है, जहाँ इंटरफेस को बदला गया होता है या किसी अलग प्रोडक्ट या सर्विस को प्रमोट करने या ऑफर करने के लिए रीडायरेक्ट किया जाता है
- कई बार हिडन चार्जेज बिना बताए ही अकाउंट से काट लिए जाते हैं
- ऑनलाइन बैंकिंग प्लेटफॉर्म पर कई बार कन्फ्यूजिंग या गुमराह करने वाली भाषा (जैसे, डबल नेगेटिव, साफ ऑप्शन नहीं) होती है – जैसे मैसेज से ऑप्ट आउट करना या ऑफर मना करना
छिपे हुए शुल्क यूजर्स के लिए परेशानी
जब बैंकिंग की बात आती है, तो कस्टमर्स को कई मुश्किलें होती हैं। उदाहरण के लिए, कोई बैंकिंग ऐप फ्री या कम कीमत वाली सर्विस का विज्ञापन कर सकता है, लेकिन फिर जब यूजर कोई ट्रांजैक्शन शुरू करता है, तो उसमें ट्रांसफर फीस, मेंटेनेंस चार्ज या अकाउंट इनएक्टिविटी फीस जैसे हिडन चार्जेज जोड़ दिए जाते हैं।
ये फीस तभी पता चलती हैं जब यूजर प्रोसेस पूरा करने वाला होता है। नतीजा यह होता है कि ट्रांजैक्शन के आखिरी स्टेज पर अचानक चार्ज या फीस लग जाती है, जबकि यूजर पहले ही समय और मेहनत लगा चुका होता है। कई दूसरे मामलों में, चार्ज पहले नहीं बताए जाते, बल्कि बाद में बिल में जोड़ दिए जाते हैं।
अकाउंट बंद करना और मुश्किल
अकाउंट बंद करना, अकाउंट खोलने से कहीं ज्यादा मुश्किल है। आखिरी समय में छिपी हुई फीस सामने आती है, और डेटा शेयरिंग से ऑप्ट आउट करना किसी भूलभुलैया में घूमने जैसा लगता है। ये कोई गड़बड़ या चूक नहीं हैं, ये डिजिटल यूजर्स के फैसलों में हेरफेर करने के लिए सावधानी से बनाए गए डार्क पैटर्न हैं। इन्हीं समस्याओं को RBI हल करने की कोशिश कर रहा है।
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