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Gen Z पर नई रिपोर्ट, 31% पुरुष चाहते हैं पत्नी को माननी चाहिए पति की बात

LHC0088 7 hour(s) ago views 396
Gen Z Men Attitudes: जरा रुकिए, क्या TikTok जनरेशन को आज्ञाकारी पत्नियां चाहिए? एक ऐसी जनरेशन जिसे अक्सर पोसेसिव, डिजिटली अवेयर और सामाजिक रूप से समझने वाला माना जाता है, उसी Gen Z के पुरुषों के बारे में एक नई रिसर्च ने चौंकाने वाली बात बताई है।



यह वैश्विक अध्ययन Ipsos और Global Institute for Women’s Leadership (जो King’s College London से जुड़ा है) ने किया है। यह रिपोर्ट International Women’s Day 2026 से ठीक पहले सामने आई। इस अध्ययन में 29 देशों के 23,000 लोगों ने भाग लिया और इससे पता चला कि Gen Z के 31% पुरुष इस बात से सहमत हैं कि पत्नी को हमेशा अपने पति की बात माननी चाहिए। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि 33% का कहना है कि शादी में महत्वपूर्ण फैसलों पर पति का अंतिम निर्णय होना चाहिए।



ये नतीजे चौंकाने वाले हैं, क्योंकि इनसे पता चलता है कि पिछली जनरेशन की तुलना में Gen Z के पुरुषों में इन विचारों के होने की संभावना अधिक है।




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तुलना के लिए, बेबी बूमर जनरेशन के केवल 13% पुरुषों ने इस बात से सहमति जताई कि पत्नियों को अपने पतियों की बात माननी चाहिए, और 17% का मानना ​​था कि घरेलू फैसलों में पतियों का अंतिम निर्णय होना चाहिए।



Gen Z में जेंडर सोच का विरोधाभास



इस अध्ययन में Gen Z की सोच में दो तरह की सोच देखने को मिली। एक तरफ वे सफल महिलाओं को आकर्षक मानते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे घर में पारंपरिक भूमिकाओं की उम्मीद भी रखते हैं। लगभग 41% Gen Z पुरुषों ने कहा कि सफल करियर वाली महिलाएं अधिक आकर्षक होती हैं, जबकि बेबी बूमर्स में यह आंकड़ा 27% है।



रिसर्च करने वालों का कहना है कि यह स्थिति Gen Z की सोच में दो तरह के नजरिए को दिखाती है। यानी एक तरफ वे महत्वाकांक्षी और सफल महिलाओं की सराहना करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ घर में पारंपरिक भूमिकाओं की उम्मीद भी रखते हैं।



इप्सोस यूके और आयरलैंड की CEO केली बीवर ने इसे “जेंडर रोल्स की बड़ी नई बातचीत” बताया। उन्होंने कहा, “हमारे आंकड़े Gen Z के बीच एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाते हैं। एक तरफ वे सबसे ज्यादा मानते हैं कि सफल करियर वाली महिलाएं आकर्षक होती हैं, लेकिन दूसरी तरफ वही लोग यह भी मानते हैं कि पत्नी को हमेशा पति की बात माननी चाहिए।“



पुरुषों के लिए भी पारंपरिक उम्मीदें



दिलचस्प बात यह है कि शोध में यह भी पाया गया कि Gen Z के पुरुष खुद से ज्यादा सख्त उम्मीदे रखते हैं। उदाहरण के लिए:



43% का मानना ​​है कि युवा पुरुषों को शारीरिक रूप से मजबूत बनने का प्रयास करना चाहिए, भले ही यह उनका स्वभाव ऐसा न हो।



30% का मानना ​​है कि पुरुषों को अपने पुरुष मित्रों से “आई लव यू“ नहीं कहना चाहिए।



21% का कहना है कि जो पुरुष बच्चों की देखभाल में हिस्सा लेते हैं, वे कम मर्दाना होते हैं।



इन विचारों से पता चलता है कि भले ही इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बराबरी की बातें खूब होती हैं, लेकिन कई युवा पुरुष अब भी मर्दानगी की पारंपरिक सोच के दबाव को महसूस करते हैं।



ग्लोबल इंस्टीट्यूट फॉर विमेंस लीडरशिप की डायरेक्टर प्रोफेसर हीजुंग चुंग ने वेबसाइट पर अध्ययन के बारे में बताया कि ये नतीजे दिखाते हैं कि सामाजिक अपेक्षाएं व्यवहार को कैसे प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा, “हमारे डेटा से पता चलता है कि लोगों की अपनी सोच और समाज की अपेक्षाओं के बीच बड़ा अंतर है।“ “यह दबाव खासकर Gen Z के पुरुषों पर ज्यादा दिखाई देता है, जिन्हें अक्सर पारंपरिक मर्दानगी की सख्त सोच के मुताबिक चलने का दबाव महसूस होता है।“



Gen Z की महिलाओं की सोच



इस अध्ययन में Gen Z के पुरुषों और महिलाओं की सोच में साफ अंतर भी सामने आया।



Gen Z की केवल 18% महिलाओं ने कहा कि पत्नियों को अपने पतियों की बात माननी चाहिए, और पिछली जनरेशन की तो और भी कम महिलाएं इस बात से सहमत थीं।



इसी तरह, बहुत कम महिलाओं का मानना है कि महिलाओं की आजादी या स्वतंत्रता को रोकना चाहिए।



पुरुषों और महिलाओं की सोच में यह अंतर दिखाता है कि आज के समय में रिश्तों, मर्दानगी और जेंडर इक्वलिटी को लेकर समाज में नई और बड़ी चर्चा चल रही है।



क्या जेंडर भूमिकाओं को लेकर नई सोच बन रही है?



शोधकर्ताओं का कहना है कि इन नतीजों को पीछे की ओर कदम नहीं माना जाना चाहिए। बल्कि इस बात का प्रमाण माना जाना चाहिए कि आधुनिक समाज में लैंगिक भूमिकाओं पर पुनर्विचार किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की पूर्व प्रधानमंत्री और ग्लोबल इंस्टीट्यूट फॉर विमेंस लीडरशिप की अध्यक्ष जूलिया गिलार्ड ने कहा कि ये नेतिजे दर्शाते हैं कि जेंडर इक्वलिटी पर बातचीत क्यों महत्वपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा, “यह चिंताजनक है कि जेंडर इक्वलिटी को लेकर लोगों की सोच इतनी तेजी से बेहतर नहीं हो रही है। लेकिन हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हर कोई यह समझे कि जेंडर इक्वलिटी से समाज को लाभ होता है।“



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