



रामबाबू मित्तल, मेरठ: ऑपरेशन सिंदूर के बाद आधुनिक युद्ध की बदलती तस्वीर के बीच मेरठ में एक अत्याधुनिक ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (RPA) बेस स्थापित करने की तैयारी जल्द शुरू होने वाली है। सूत्रों की माने तो हाल ही में बरेली से आए सेना के वरिष्ठ अधिकारी ने सैन्य क्षेत्र की विभिन्न जमीनों का निरीक्षण किया और एक उपयुक्त स्थान चिह्नित कर गए। इससे संकेत साफ हैं कि मेरठ में जल्द ही भारत का पहला ड्रोन रनवे बनकर सेना को समर्पित किया जाएगा।सेना सूत्रों के अनुसार, करीब 900 एकड़ में प्रस्तावित इस मिलिट्री एविएशन बेस के केंद्र में 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे बनाया जाएगा। यह रनवे केवल ड्रोन ऑपरेशन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि C-295 और C-130 जैसे मध्यम श्रेणी के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को भी संभालने में सक्षम होगा। रनवे को ICAO CAT-II मानकों के अनुरूप आधुनिक लाइटिंग और नेविगेशनल सिस्टम से लैस किया जाएगा, जिससे कम दृश्यता में भी सुरक्षित संचालन संभव होगा।BRO विकसित करेगाइस परियोजना को रक्षा मंत्रालय के तहत कार्यरत सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा विकसित किया जाएगा। लगभग 410 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी सेवाओं का टेंडर जल्द जारी होने की संभावना है। योजना के अनुसार, दो विशाल हैंगर, प्रत्येक 60x50 मीटर निर्मित किए जाएंगे, जहां एयरक्राफ्ट और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) RPAs की तैनाती और रखरखाव किया जाएगा।ड्रोन रणनीति का मुख्य आधार बन चुके हैंरक्षा जानकारों की माने तो इस योजना की पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब ड्रोन तकनीक युद्ध के मैदान में निर्णायक भूमिका निभा रही है। हालिया ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स का व्यापक उपयोग किया गया, जिससे रियल टाइम निगरानी, सटीक लक्ष्य निर्धारण और सैनिकों की सुरक्षा में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि आधुनिक संघर्षों में ड्रोन अब सहायक उपकरण नहीं, बल्कि रणनीति का मुख्य आधार बन चुके हैं।लगभग 1,500 RPA ऑपरेशन को सपोर्ट करेगा बेससेना रक्षा जानकारों की माने तो प्रस्तावित बेस हर वर्ष भारी विमान आवागमन के साथ लगभग 1,500 RPA ऑपरेशन को सपोर्ट करेगा। औसतन प्रतिदिन चार ड्रोन सॉर्टी संचालित की जा सकेंगी। HALE श्रेणी के ड्रोन लंबी अवधि तक ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम होते हैं, जिससे सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में निरंतर निगरानी संभव हो पाती है। यह क्षमता संभावित खतरों का पूर्वानुमान लगाने और त्वरित प्रतिक्रिया देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।कुछ इस तरह चलेगा कामपरियोजना की कुल समय सीमा 85 से 90 महीने के बीच निर्धारित की गई है। शुरुआती सात महीने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) और प्री-अवार्ड प्रक्रियाओं के लिए तय है। इसके बाद 18 महीने निर्माण कार्य चलेगा। 24 महीने का डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड और 36 से 40 महीने का मेंटेनेंस ओवरसाइट चरण सुनिश्चित करेगा कि बेस पूरी तरह ऑपरेशनल और तकनीकी रूप से सक्षम रहे। रणनीतिक दृष्टि से यह बेस केवल एक एयरस्ट्रिप नहीं, बल्कि भविष्य की युद्धक तैयारियों का नर्व सेंटर साबित होगा। |