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भारत: वैश्विक दक्षिण में AI सम्मेलन, 'समावेशन की शक्तिशाली धारा'

deltin55 Yesterday 18:43 views 273

AI Impact Summit नामक इस पाँच दिवसीय शिखर सम्मेलन में, 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख, 60 से ज़्यादा मंत्री और 500 से अधिक वैश्विक एआई विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं.

शिरकत का यह स्तर दिखाता है कि अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े फ़ैसलों में, अधिक देशों और अलग-अलग दृष्टिकोणों की भागेदारी ज़रूरी मानी जा रही है.

आयोजकों का कहना है कि सम्मेलन का उद्देश्य सिर्फ़ चर्चा करना भर नहीं, बल्कि नीतियों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के रास्ते तलाश करना है, ताकि एआई समावेशी विकास को बढ़ावा दे, सार्वजनिक प्रणालियों को मज़बूत बनाए और सतत विकास की गति तेज करे.





  
   
  


              
            

            
         
         
         
         
        



      
      



              
      
   




डिजिटल और उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव अमनदीप सिंह गिल ने, सोमवार को इस सम्मेलन के पहले दिन यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में कहा कि यह सम्मेलन, एआई से जुड़े फ़ैसलों को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक अहम क़दम है.

उन्होंने बताया कि जुलाई (2026) में होने वाला पहला वैश्विक एआई शासन संवाद, देशों को नीतियों पर मिलकर काम करने का अवसर देगा. उनके अनुसार एआई प्रभाव सम्मेलन जैसे मंच “समावेशन की एक शक्तिशाली धारा” की तरह हैं, जो सामूहिक प्रयास से एआई के भविष्य को दिशा दे रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने लगभग 90 जोखिम वाले देशों की सहायता के लिए, 3 अरब डॉलर तक का स्वैच्छिक वैश्विक कोष प्रस्तावित किया है. साथ ही, एआई पर 40 विशेषज्ञों का एक अन्तरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल गठित किया गया है, जो एआई के विकास और प्रभावों पर नज़र रखते हुए, साक्ष्य-आधारित रिपोर्ट जारी करेगा, ताकि सरकारों, कम्पनियों और समाज को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिल सके.

अमनदीप सिंह गिल ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता कृषि, शिक्षा, उद्योग और जलवायु जैसे क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है. यह उत्सर्जन के स्रोत पहचानने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है.

हालाँकि उन्होंने आगाह भी किया कि एआई के तेज़ विस्तार से नई चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं, जैसेकि डेटा केन्द्रों के लिए अधिक ऊर्जा, पानी और संसाधनों की जरूरत.

एआई जलवायु लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे कितनी ज़िम्मेदारी से विकसित और लागू किया जाता है.

उन्होंने यह भी कहा कि ग़लत जानकारी, पक्षपात और सुरक्षा जोखिमों से बचाव के लिए, मज़बूत नियम एवं सुरक्षा उपाय ज़रूरी हैं, और संयुक्त राष्ट्र इस दिशा में देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है.

  
  
            
      




अमनदीप सिंह गिल ने कहा कि एआई की प्रगति से विकासशील देश पीछे नहीं रह जाएँ, यह सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है.

एआई के क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी अभी कम है, लेकिन वे सुरक्षा, भाषाई विविधता और ‘ओपन-सोर्स’ नवाचार जैसे अहम क्षेत्रों का नेतृत्व कर रही हैं.

साथ ही, छोटे, स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक़ बने और कम ऊर्जा खपत वाले एआई मॉडल, तकनीक को ज़्यादा लोगों तक पहुँचा सकते हैं और दुनिया भर के समुदायों के लिए इसे अधिक उपयोगी बना सकते हैं.

वहीं संयुक्त राष्ट्र के आपदा जोखिम न्यूनीकरण (UNDRR) मामलों के प्रमुख कमल किशोर का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपदाओं के जोखिम को कम करने में बेहद प्रभावी साबित हो सकती है. एआई पहले से ख़तरे का अनुमान लगा सकती है, जोखिम वाले इलाक़ों और लोगों की पहचान कर सकती है, तथा समय रहते तैयारी व राहत के क़दम उठाने में मदद करती है, जिससे नुक़सान को कम किया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि भविष्य में एआई शहरों की योजना और निर्माण की सुरक्षा का विश्लेषण करके, जोखिम कम करने में भी सहायक हो सकती है.

आपदाओं की समय पूर्व चेतावनी से बचाव तक, AI का है अहम योगदान

कमल किशोर ने AI आधारित बाढ़ पूर्वानुमान प्रणालियों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये पारम्परिक तरीक़ों से तेज़ और ज़्यादा सटीक हैं. साथ ही उन्होंने ज़ोर देकर यह भी कहा कि एआई का उपयोग हमेशा नैतिक ढंग से, मानवीय निगरानी और मज़बूत व्यवस्था के साथ होना चाहिए.

कमल किशोर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की अहम भूमिका - यह सुनिश्चित करने में है कि कम संसाधनों वाले देश भी, एआई के विकास और उससे जुड़े फ़ैसलों में शामिल हों, ताकि कोई पीछे नहीं रह जाए.

उन्होंने चेतावनी दी कि एआई का दुरुपयोग ग़लत जानकारी फैलाने जैसे ख़तरे पैदा कर सकता है, इसलिए इनसे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर एकजुट होकर काम करना ज़रूरी है.





  
   
  
              
            

            
         
         
         


         
        



      


      



              
      
   




अभिनेत्री और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) भारत की समर्थक सोहा अली ख़ान ने, लैंगिक समानता और तकनीक पर एक उच्चस्तरीय सत्र में कहा कि एआई को नैतिक और लैंगिक मुद्दों के लिए संवेदनशील तरीक़े से विकसित करना ज़रूरी है, ताकि डिजिटल दुनिया, महिलाओं व लड़कियों के लिए सुरक्षित बन सके.

उन्होंने कहा कि तकनीक ने महिलाओं के लिए नए अवसर खोले हैं, लेकिन उनका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब वे ऑनलाइन सुरक्षित महसूस करें.

विशेषज्ञों ने भी रेखांकित किया कि भारत जैसे देशों में बड़ी संख्या में महिलाएँ पहली बार इंटरनेट से जुड़ रही हैं, इसलिए एआई से जुड़े आज के फ़ैसले, भविष्य की अधिक समावेशी एवं अधिकार-आधारित डिजिटल व्यवस्था तय कर सकते हैं.





  
   
  
              
            

            
         


         
         
         
        



      
      

              
      
   




आयोजकों का कहना है कि इस शिखर सम्मेलन का मक़सद, अन्तरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और ऐसे ठोस सुझाव तैयार करना है, जिनसे एआई लोगों, अर्थव्यवस्थाओं और पर्यावरण के लिए वास्तविक लाभ ला सके.

यूएन डिजिटल प्रौद्योगिकी दूत अमनदीप सिंह गिल के अनुसार, आने वाले वर्षों में असली सफलता तब होगी जब अधिक देश अपनी एआई प्रणाली ख़ुद विकसित एवं नियंत्रित कर सकें, नियमों में बेहतर वैश्विक तालमेल हो और एआई का उपयोग, सतत विकास, शान्ति तथा मानवाधिकार जैसे लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में हो.
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