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पतंजलि विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन; स्वस्थ धरा, स्थायी कृषि और खाद्य सुरक्षा को लेकर हुआ मंथन

deltin33 2025-10-29 22:37:36 views 984
  

जैव विविधता ही कृषि प्रणाली की सफलता की कुंजी- आचार्य बालकृष्ण



डिजिटल डेस्क, हरिद्वार। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय, पतंजलि ऑर्गेनिक रिसर्च इंस्टिट्यूट, आरसीएससीएनआर-1 के तत्वावधान में और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के सहयोग से, भरुवा एग्री साइंस के संयुक्त प्रयास में ‘स्वस्थ धरा’ योजना के अंतर्गत ‘मृदा स्वास्थ्य परीक्षण एवं प्रबंधन द्वारा गुणवत्तापूर्ण जड़ी-बूटियों की सतत खेती’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 28 अक्टूबर को पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन एवं पतंजलि विश्वविद्यालय के सहयोग से विश्वविद्यालय सभागार में संपन्न हुई। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

कार्यक्रम का उद्देश्य स्वस्थ पृथ्वी, स्थायी कृषि, दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देना और इसे वैश्विक स्तर पर मजबूत करना था। इसमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय किसान, शोधकर्ता, कृषि विशेषज्ञ और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ शामिल हुए, जिन्होंने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के तकनीकी उपायों पर चर्चा की। कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने मुख्य अतिथियों का स्वागत पुष्प गुच्छ, अंग वस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट करके किया। शुभारम्भ दीप प्रज्वलन, स्वस्थ धरा और चंद्रमोहन की टीम के समूहगान से हुआ। स्वागत उद्बोधन डॉ. ए.के. मेहता, निदेशक तकनीकी, उद्यानिकी, पतंजलि ऑर्गेनिक रिसर्च इंस्टीट्यूट ने दिया।

आचार्य ने अपने प्रेरक संबोधन में योग, ऋषि और हरित क्रांति का संदेश देते हुए कहा कि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से मूक धरती पीड़ा झेल रही है, जिसका दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। उन्होंने कृत्रिम खेती के स्थान पर जैविक खेती अपनाने का आग्रह किया। स्वामी जी के अनुसार देश में कुल फूड प्रोसेसिंग का 10% कार्य होता है, जिसमें पतंजलि की भागीदारी 8% है। आंवला, एलोवेरा, अनाज और तिलहन उत्पादन में पतंजलि अग्रणी है। संस्था प्रकृति, पर्यावरण और धरती के संरक्षण हेतु समर्पित है तथा बायो कंपोस्ट और आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर निरंतर अनुसंधान कर रही है। भारत सरकार के सहयोग से पतंजलि ने 80,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है।

प्रौद्योगिकी के साथ मृदा प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलावों की बात करते हुए कहा कि फसल उत्पादकता को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों में मृदा प्रबंधन एक बुनियादी प्रक्रिया है जो भूमि स्वास्थ्य और कृषि स्थिरता को प्रभावित करती है। आज खेती में प्रौद्योगिकी की बढ़ती केंद्रीय भूमिका से मृदा प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से हमारे किसान मृदा परीक्षण, मिट्टी प्रबंधन, फसल नियोजन, सिंचाई और कीट नियंत्रण में सुधार कर सकते हैं। उन्होंने तकनीकी एकीकरण से टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने और संबंधित चुनौतियों के समाधान पर भी विशेष बल दिया।

परम पूज्य स्वामी जी ने अपने विचारों में वेदों की गहराई में जाकर उनके गूढ़ रहस्यों, दर्शन और सिद्धांतों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वेद केवल सतही ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और सृष्टि के वैज्ञानिक आधार के प्रतीक हैं। स्वामी जी ने बताया कि कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है जो नई तकनीकों, उच्च उत्पादक किस्मों तथा मृदा और कृषि रोगों के नियंत्रण के उपायों के माध्यम से किसानों को शिक्षित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है जब हमारी मृदा रोगमुक्त और स्वस्थ हो। कृषि वैज्ञानिक अनुसंधान व नवाचार के माध्यम से टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियाँ विकसित कर रहे हैं।

पतंजलि द्वारा निर्मित ऑटोमेटेड मृदा परीक्षण मशीन “डीकेडी” फसल की उपज में उल्लेखनीय वृद्धि कर रही है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सेवा-आधारित कृषि पद्धतियों पर बोलते हुए स्वामी जी ने कहा कि मिट्टी तभी उपयोगी सिद्ध होती है जब उसे सुधारने वाली प्रबंधन तकनीकें अपनाई जाएँ, जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों में उत्पादकता व लाभप्रदता बढ़ सके। स्वस्थ मिट्टी कम लागत में अधिक उत्पादन देने में सक्षम होती है। जैव विविधता ही कृषि प्रणाली की सफलता की आधारशिला है, जो मृदा स्वास्थ्य, लागत नियंत्रण और लाभप्रदता में संतुलन लाती है। साथ ही, वर्तमान समय में संभावित औषधीय वनस्पतियों की कृषि-प्रौद्योगिकी के विकास को अत्यंत आवश्यक बताया।

विशिष्ट अतिथि उप महानिदेशक (कृषि प्रसार) आईसीएआर डॉ. राजबीर सिंह ने पतंजलि को हरित क्रांति की केन्द्रीय भूमिका को उजागे करते हुए कहा कि उत्तराखंड में पलायन रोकने के लिए जड़ी-बूटियों की खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि पतंजलि विविध कृषि उत्पादों की सीधी खरीद कर किसानों की आय दोगुनी करने का प्रयास कर रहा है। डिजिटल युग में पतंजलि ने भरूआ सोल्यूशन के माध्यम से बी-बैंकिंग प्रणाली अपनाकर किसानों को डिजिटल रूप से जोड़ा है, जिससे ऋण प्रक्रिया में पारदर्शिता आई है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन ‘स्वस्थ धरा’ प्रबंधन, परिशुद्ध कृषि और मृदा स्वास्थ्य सुधार की दिशा में वैश्विक प्रेरणा बनेंगे। भूतपूर्व कुलपति, शेर-ए-कश्मीर कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय जम्मू, डॉ. प्रदीप शर्मा ने कहा कि मृदा स्वास्थ्य पौधों, पशुओं और मानव जीवन के लिए आधार है जो मिट्टी की जैविक उत्पादकता बनाए रखते हुए जल और वायु की गुणवत्ता सुधारता है।

इसके संरक्षण हेतु एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, फसल चक्रण, समतल फसलें और मृदा परीक्षण आवश्यक हैं। आईसीएआर भोपाल के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजय वास्तव ने रिमोट सेंसिंग और डीएनए अनुक्रमण तकनीकों की भूमिका बताते हुए कहा कि ये विधियाँ मृदा की स्थिति, क्षरण और पोषक तत्वों की कमी का सटीक मूल्यांकन कर किसानों को त्वरित निर्णय लेने में मदद करती हैं। अन्य विशेषज्ञों डॉ. टी.जे. पुरकायस्थ, डॉ. आर.के. सेतिया, प्रो. अजय नामदेव, डॉ. बलजीत सिंह, डॉ. जी.पी. राव, डॉ. जे. ए. एन रैना, डॉ. गुलशन कुमार ढींगरा ने मृदा स्वास्थ्य परीक्षण, औषधीय पौधों की गुणवत्ता नियंत्रण और कृषि-प्रौद्योगिकी विकास पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम के सफल समापन पर धन्यवाद व्यक्त करते हुए पतंजलि अनुसंधान संस्थान के जड़ी-बूटी अनुसंधान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. वेदप्रिया आर्य ने पतंजलि की आगामी योजनाओं, ऑनलाइन डिस्टेंस कोर्स और पाठ्यक्रमों की जानकारी साझा की। संगोष्ठी से स्पष्ट हुआ कि पौधे सूर्य के प्रकाश से कार्बन डाइऑक्साइड और जल को कार्बोहाइड्रेट में बदलकर जड़, तना, पत्ते और बीज के निर्माण में सहायक होते हैं, जिससे नई संभावनाएँ उत्पन्न होती हैं। नाबार्ड प्रतिनिधियों ने पतंजलि फूड, हर्बल गार्डन और अनुसंधान केंद्र का भ्रमण कर उसके प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम का समापन अतिथियों और प्रतिभागियों के आभार के साथ हुआ।
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