25 परिवारों वाले इस छोटे से गांव में हर आंख नम है और हर दिल अपने लाल के अंतिम दर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है। जागरण
घनश्याम जोशी, जागरण, बागेश्वर। देश की सेवा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए गजेंद्र गढ़िया के गांव में सोमवार की रात शोक रहा। कपकोट के वीथी-गैनाड़ गांव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला। 25 परिवारों वाले इस छोटे से गांव में हर आंख नम है और हर दिल अपने लाल के अंतिम दर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है।
गांव वालों के अनुसार गजेंद्र जैसा मिलनसार और मददगार व्यक्ति पूरे क्षेत्र में दूसरा नहीं था। उनके बलिदान की खबर से पूरा गांव फूट-फूट कर रो रहा है। सबसे मार्मिक स्थिति यह है कि बलिदानी की मां चंद्रा गढ़िया को अभी तक यह नहीं बताया गया है कि उनका बेटा देश के लिए बलिदान हो गया है। घर में मां के साथ बुआ रमुली देवी हैं, जो अनहोनी की आशंका से सहमी हुई हैं।
बलिदानी के पिता किशन सिंह गढ़िया एक माह पूर्व बैल के हमले में घायल हो गए थे, जिससे उनकी एक पसली टूट गई है। वह उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कपकोट के चक्कर काट रहे हैं और देर शाम तक घर नहीं लौट पाए। गांव से लगभग एक किमी दूर सुनसान स्थान पर बैठे चाचा किशन सिंह गढ़िया अपने भाई के लौटने का इंतजार करते हुए बार-बार भावुक हो जा रहे हैं। उन्होंने कहा गजेंद्र जैसा इंसान शायद ही दोबारा पैदा हो। वह हर किसी की मदद को हमेशा आगे रहता था।
बताया गया कि गजेंद्र हाल ही में मादो माह में अपने परिवार के साथ गांव आए थे और बाण देवता के मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। किसी को क्या पता था कि यह उनकी अंतिम यात्रा होगी। गजेंद्र की पत्नी लीला गढ़िया, 10 वर्षीय पुत्र राहुल और आठ वर्षीय पुत्र धीरज घर के लिए रवाना हैं, लेकिन रात होने के कारण उन्हें कपकोट में ही रुकना पड़ सकता है। गजेंद्र की बहनें खष्टी और पुष्पा विवाहित हैं, जबकि 30 वर्षीय छोटा भाई किशन गढ़िया अभी अविवाहित है।
खराब रास्ता बना बाधा, अंतिम दर्शन को आतुर ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि पार्थिव शरीर के गांव पहुंचने का सभी को बेसब्री से इंतजार है। कपकोट से गांव की दूरी लगभग 10 किमी है, जिसमें कच्ची सड़क जगह-जगह से कटी हुई है। इसके अलावा लगभग तीन किमी का पैदल रास्ता वह भी घने जंगल के बीच खड़ी चढ़ाई भी तय करनी पड़ती है। बावजूद इसके, गांव का हर व्यक्ति अपने लाल के अंतिम दर्शन के लिए आतुर है। वीर सपूत के बलिदान ने पूरे गांव को एक परिवार में बदल दिया है। जहां आज आंसू ही भोजन हैं और इंतजार ही प्रार्थना।
यह भी पढ़ें- Kishtwar में आतंकियों से मुठभेड़ में उत्तराखंड का लाल बलिदान, वीर गजेंद्र सिंह का गांव शोक में डूबा |