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दिल्‍ली से सूरत तक फेल इस फोरलेन योजना पर दांव लगाएगा देहरादून, आम लोगों के‍ लिए साबित हुई घातक

deltin33 5 hour(s) ago views 933
  

कुछ ही वर्षों में कई शहरों में ट्रैफिक जाम, जनविरोध और शहरी अव्यवस्था का पर्याय बना बीआरटीएस। प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर



अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ई- बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम के तहत इलेक्ट्रिक सार्वजनिक बसों के लिए आरक्षित फोरलेन बनाने की तैयारी है। दावा है कि इससे ई-सार्वजनिक परिवहन मजबूत होगा और ट्रैफिक का दबाव कम होने के साथ ही प्रदूषण घटेगा, लेकिन देश के कई बड़े शहरों का अनुभव बताता है कि बीआरटीएस की कल्पना जितनी आकर्षक है, यह प्रयोग उतना ही जोखिम भरा साबित हुआ है।

दिल्ली, इंदौर, भोपाल और जोधपुर जैसे शहरों में इसे भविष्य का माडल बताकर शुरू किया गया, लेकिन कुछ ही वर्षों में यह ट्रैफिक जाम, जनविरोध और शहरी अव्यवस्था का पर्याय बन गया। अंततः इन शहरों को इसे हटाने या बेहद सीमित करने का फैसला लेना पड़ा।
बसों की लेन आरक्षित होने से प्रभावित हुआ अन्य वाहनों का संचालन

दिल्ली में वर्ष 2008 में अंबेडकर नगर-मूलचंद बीआरटीएस कारीडोर को शुरू किया गया। सीमित चौड़ाई वाली सड़कों पर एक पूरी लेन बसों के लिए आरक्षित करने से निजी वाहनों और दोपहिया वाहनों के लिए जगह बेहद कम हो गई। ट्रैफिक जाम-दुर्घटनाएं बढ़ीं और असंतोष पैदा हुआ। वर्ष 2016 में सरकार ने बीआरटीएस को पूरी तरह हटा दिया।

इंदौर में वर्ष 2013 में 11.5 किलोमीटर लंबे बीआरटीएस कारीडोर को शुरुआत में सराहना मिली, लेकिन अन्य वाहनों की संख्या बढ़ते ही दबाव बढ़ गया। कई हिस्सों में कारीडोर को हटाना पड़ा। भोपाल में वर्ष 2009 में शुरू किया गया 24 किलोमीटर लंबा बीआरटीएस भी सड़क क्षमता घटने, दुर्घटनाओं और जनविरोध के चलते 2019 में हटा दिया गया। जोधपुर में वर्ष 2014 में लागू बीआरटीएस भी संकरी सड़कों के कारण असफल रहा।
सामान्य यातायात पर प्रभाव का अध्ययन जरूरी

देहरादून में स्थिति संवेदनशील है। शहर में पंजीकृत कुल वाहनों में करीब 94 प्रतिशत निजी वाहन हैं, जबकि सार्वजनिक ई-बसों और ई-सार्वजनिक वाहनों की संख्या काफी कम है। वहीं आइएसबीटी, राजपुर रोड और सहारनपुर रोड पहले से ही हाई-कंजेशन जोन हैं। ऐसे में केवल सार्वजनिक ई-बसों-वाहनों के लिए लेन आरक्षित होने से सामान्य यातायात पर प्रभाव का अध्ययन करना जरूरी है।
मेट्रो रेल कारपोरेशन ने किए कई अधूरे प्रयोग

यह पहली बार नहीं है कि उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन (यूकेएमआरसी) कोई ऐसा प्रोजेक्ट लेकर आया हो, जो दून के लिए व्यावहारिक नहीं है। इससे पूर्व यूकेएमआरसी देहरादून- हरिद्वार क्षेत्र के लिए कई शहरी परिवहन परियोजनाओं पर काम कर चुका है। इनमें से अधिकांश योजनाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ पाईं।

मेट्रो परियोजना, मेट्रोलाइट, मेट्रो-नियो जैसे प्रोजेक्ट को केंद्र ने मंजूरी ही नहीं दी। हरिद्वार में रैपिड ट्रांजिट सिस्टम में निवेशकों ने रुचि नहीं दिखाई। देहरादून में मेट्रो, पाड टैक्सी और वैकल्पिक शहरी मोबिलिटी माडल भी चर्चा तक सीमित रहा। विशेषज्ञ मानते हैं कि ई-बीआरटीएस को लागू करने के लिए पुराने अधूरे प्रयोगों से मिली सीख जरूरी है।
अन्य शहर जहां बीआरटीएस टिक नहीं पाया

  • पुणे- वर्ष 2006 में लागू, बाद में पूरी तरह हटाया गया
  • जयपुर- वर्ष 2011 में शुरू, 2016 में हटाया गया
  • अमृतसर- वर्ष 2014 में लागू, बाद में प्रभावहीन किया
  • राजकोट- वर्ष 2012 में शुरू, बाद में वापस लिया गया
  • सूरत: वर्ष 2013 में शुरू, कई हिस्सों में हटाना पड़ा


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