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पाकिस्तान में भी है ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर की संपत्ति, उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति करेगी तलाश

cy520520 Yesterday 22:26 views 482
  

वृंदावन से लेकर देश के विभिन्न प्रांतों में संपत्तियां अब होंगी संरक्षित।  



संवाद सहयोगी, वृंदावन। ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर की संपत्तियां केवल देश के विभिन्न प्रांतों ही नहीं बल्कि विदेश में भी हैं। पाकिस्तान में भी ठाकुर जी की संपत्तियां हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति ने कोटा में 15 हेक्टेयर मंदिर की भूमि चिन्हित की तो अन्य प्रांतों में फैली संपत्तियों के संरक्षण की भी उम्मीद जागी है। समिति ने विभिन्न प्रांतों में फैली संपत्तियों के संरक्षण के लिए डीएम के माध्यम से पत्राचार जल्द शुरू करने को कहा है।

ठाकुर बांकेबिहारी के भक्त अपने आराध्य की सेवा में तन, मन व धन से समर्पित रहे हैं। पहले भरतपुर के महाराजा ने अपना बगीचा दान देकर ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर की स्थापना कराई तो किशोरपुरा पर करीब पांच सौ वर्गगज का एक भूखंड एक श्रद्धालु ने करीब पांच दशक पहले मंदिर को दान दिया। मंदिर सेवायत प्रह्लादवल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि ठाकुर बांकेबिहारी के नाम से वृंदावन ही नहीं देश के विभिन्न प्रांतों के अलावा पाकिस्तान में भी बड़ी संपत्ति है।

उन्होंने बताया ग्रंथों में उल्लेख है कि ठाकुरजी की सेवा में उनके प्राकट्यकाल से लेकर अब तक बहुत सी चल-अचल संपत्तियां भेंट व दान में मिलीं। दानदाता भक्तों में हिंदू राजा-महाराजाओं के साथ मुस्लिम नवाबों के नाम भी शामिल रहे। वर्ष 1592 में जयपुर नरेश सवाई महाराजा मानसिंह ने तीन एकड़ जमीन, 1594 में मुगल सम्राट अकबर ने 25 बीघा जमीन वृंदावन और राधाकुंड में, वृंदावन में ही वर्ष 1595 में हरिराम व्यास ने किशोरपुरा में भूखंड, 1596 में मित्रसेन कायस्थ व उनके सुपुत्र बिहारिनदास नामक भक्त ने बिहारिनदेव टीलावाली भूमि के अलावा वर्ष 1748 में जयपुर नरेश सवाई महाराजा ईश्वरी सिंह ने 1.15 एकड़ जमीन दान दी।

वर्ष 1769 में भरतपुर और करौली सरकार द्वारा भूमिदान, 1780 में विंध्याचल राजपरिवार ने भूमि व बहुमूल्य आभूषण, 1785 में ग्वालियर रियासत ने भूमि-भवन व आभूषण दान दिए। वर्ष 1960 में राजस्थान के भक्त परिवार ने कोटा में 90 बीघा जमीन दी। वह कहते हैं कि दिल्ली के फराशखाने में मंदिर, भवन, वर्तमान पाकिस्तान के मुल्तान, शक्कर सिंध व सियालकोट में मंदिर-हवेली काफी प्राचीन हैं। इसका उल्लेख प्रबंध कमेटी द्वारा प्रकाशित श्रीस्वामी हरिदास अभिनंदन ग्रंथ, केलिमालजु, कृपा कोर, कथा हरिदासबिहारी की, मथुरा ए डिस्ट्रिक्ट मेमोयर, ब्रजभूमि इन मुगल टाइम्स में है।

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