भारतीय संविधान का इतिहास 1773 से 1935 तक कैसे बदली शासन व्यवस्था ब्रिटिश कानूनों ने तय की दिशा (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का संविधान एक दिन में नहीं बना, बल्कि इसके पीछे लगभग 200 साल लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है। ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए कई कानूनों और सुधारों ने भारत की प्रशासनिक, राजनीतिक और विधायी व्यवस्था को धीरे-धीरे आकार दिया। इन्हीं कानूनों के अनुभवों के आधार पर बाद में स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार हुआ।
1773 से लेकर 1935 तक कई महत्वपूर्ण अधिनियम लागू किए गए, जिनका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को नियंत्रित करना और भारत में प्रशासन को व्यवस्थित करना था। समय के साथ इन कानूनों में भारतीयों की भागीदारी भी बढ़ती गई।
आइए, भारतीय संविधान के विकास की इस यात्रा को क्रमवार और आसान शब्दों में समझते हैं...
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784
रेगुलेटिंग एक्ट 1773 भारत में कंपनी सरकार पर ब्रिटिश संसद के नियंत्रण की शुरुआत था। इस कानून के तहत बंगाल की प्रेसीडेंसी को सर्वोच्च बनाया गया और बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया। गवर्नर-जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की एक परिषद बनाई गई। इस अधिनियम ने भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण और क्षेत्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को भी शुरू किया। यहीं से एक संगठित शासन व्यवस्था की नींव पड़ी।
पिट्स इंडिया एक्ट 1784 के तहत कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को अलग कर दिया गया। व्यापारिक कार्य कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास रहे, जबकि राजनीतिक मामलों की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ कंट्रोल को दी गई। भारत में कंपनी के क्षत्रों को पहली बार \“ब्रिटिश पजेशन इन इंडिया\“ कहा गया और मद्रास व बॉम्बे में गवर्नर की परिषदें गठित की गईं।
चार्टर एक्ट 1833 और 1853
चार्टर एक्ट 1833 के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी व्यापारिक अधिकार समाप्त कर दिए गए और उसे केवल प्रशासनिक संस्था बना दिया गया। बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल घोषित किया गया और पूरे ब्रिटिश भारक का प्रशासन उसके अधीन आ गया। इस अधिनियम के बाद पहली बार \“भारतसरकार\“ और \“भारतीयपरिषद\“ जैसे शब्दों का उपयोग हुआ, जिससे केंद्रीकृत शासन प्रणाली की स्पष्ट पहचान बनी।
चार्टर एक्ट 1853 ने विधायी प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाया। परिषद की विधायी बैठकों में अब मौखिक चर्चा होने लगी, विधेयक तीन चरणों में पारित किए गए और चयन समितियों को भेजे गए। पहली बार विधायी कार्य सार्वजनिक रूप से होने लगे और कार्यवाही की रिपोर्ट प्रकाशित की गई।
भारत सरकार अधिनियम 1858 और भारतीय परिषद अधिनियम 1861
भारत सरकार अधिनियम 1858 के बाद कंपनी शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इस अधिनियम ने परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों की भागीदारी की शुरुआत की। गवर्नर-जनरल को परिषद में सदस्य नामित करने का अधिकार मिला।
1862 में वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने पहली बार तीन भारतीयों को विधायी परिषद में शामिल किया, जिसमें पटियाला के महाराजा सर नरेंद्र सिंह, बनारस के राजा देव नारायण सिंह और ग्वालियर के राजा सर दिनकर राव रघुनाथ का नाम शामिल था।
भारतीय परिषद अधिनियम 1861 के तहत वायसराय की परिषदों में भारतीयों को प्रतिनिधित्व दिया गया और उन्हें गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में कार्यकारी परिषद में शामिल करने का प्रावधान किया गया।
भारतीय परिषद अधिनियम 1892 और मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909
भारतीय परिषद अधिनियम 1892 के तहत विधायी परिषदों का विस्तार किया गया। अप्रत्क्ष चुनाव (नामांकन) की व्यवस्था शुरू हुई और परिषदों को बजट पर चर्चा और कार्यपालिका से सवाल पूछने का अधिकार मिला।
मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909 के अंतर्गत पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत हुई। केंद्रीय विधान परिषद को \“इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल\“ कहा गया और इसके सदस्यों की संख्या 16 से बढ़कर 60 कर दी गई। इस अधिनियम के तहत अलग-अलग समुदायों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मान्यता दी गई। पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यकारी परिषद का सदस्य भी बनाया गया।
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 और भारत सरकार अधिनियम 1935
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 के तहत केंद्र और प्रांतों के विषय अलग किए गए और प्रांतों में द्वैध शासन (डायार्की) लागू हुआ। मंत्री चुने गए सदस्यों में से बनाए गए और वे विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थे। इसी अधिनियम से पहली बार केंद्र में द्विसदनीय विधायिका बनी और भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया। मतदान का अधिकार बढाया गया, जिससे लगभग 10% आबादी को वोट देने का अधिकार मिला।
भारत सरकार अधिनियम 1935 सबसे व्यापक कानून माना जाता है। इसमें अखिल भारतीय संघ की परिकल्पना की गई, जिसमें ब्रिटिश भारत और रियासतें शामिल होनी थीं। केंद्र प्रांतों के बीच विषयों का बंटवारा किया गया। प्रांतीय स्तर पर डायार्की समाप्त कर दी गई और केंद्र में लागू की गई। प्रांतों को अधिक स्वायत्तता मिली और 11 में से 6 प्रांतों में द्विसदनीय विधायिका बनी। इस अधिनियम के तहत संघीय न्यायालय की स्थापना हुई और भारतीय परिषद को समाप्त कर दिया गया।
क्यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस?
गणतंत्र दिवस हर साल 26 जनवरी को भारत के संविधान के लागू होने (1950) की याद में मनाया जाता है, जिससे देश एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। यह दिन औपनिवेशिक कानूनों के बजाय अपने नागरिकों द्वारा निर्मित संविधान को अपनाकर \“पूर्णस्वराज\“ का सपना पूरा होने का प्रतीक है।
\“ये मोदी की गारंटी है\“, सबरीमाला मामले की जांच को लेकर पीएम मोदी ने केरल के लोगों से किया वादा |
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