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भारत की विदेश नीति देश के अंदर एवं बाह्य दुनिया में होने वाले बदलवों के अनुरूप परिवर्तन और निरंतरता का मिश्रण है। भारत की विदेश नीति कम-से-कम चार मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है। इसका पहला और व्यापक उद्देश्य अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करना है जबकि दूसरा उद्देश्य समावेशी घरेलू विकास के लिये अनुकूल बाहरी परिवेश बनाना है। तीसरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की आवाज़ वैश्विक मंचों पर सुनी जाए। चौथा और अंतिम उद्देश्य भारतवंशियों की विदेशों में उपस्थिति से अधिकतम लाभ लेना तथा यथासंभव उनके हितों की रक्षा करना है। हमारी विदेश नीति के ये उद्देश्य पंचशील सिद्धांत पर आधारित हैं। ये पाँच सिद्धांत हैं- दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिये पारस्परिक सम्मान, परस्पर गैर-आक्रामकता, परस्पर गैर-हस्तक्षेप, समानता तथा पारस्परिक लाभ एवं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व। इन सिद्धांतों और उद्देश्यों के आलोक में ही हमें अपनी विदेश नीति संबंधी प्राथमिकताओं का चयन एवं चुनौतियाँ के प्रति प्रत्युत्तर तैयार करना होगा। इसलिये, भविष्य को देखते हुए, हमें पहले इस प्रश्न को समझना होगा कि वर्तमान विश्व की दशा और दिशा क्या है?


सबसे पहले, 2020 का दशक दुनिया में बहुसंकट का दौर है। कोविड-19 की दुर्लभ घटना से दुनिया के लोग जीवन, आजीविका, स्वास्थ्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था के गहरे नुकसान से उबर नहीं सके हैं। यूक्रेन में तोपों का गरजना थमा नहीं है और इसका ताप यूरोप से बाहर भी अनुभव किया जाने लगा है। पश्चिम एशिया में गाज़ा पट्टी, लाल सागर, लेबनान, ईरान तथा सीरिया में जारी सैन्य संघर्षों ने गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न कर दिया है, जबकि अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता इस तनावपूर्ण स्थिति को और जटिल बना रही है। अमेरिका में नए राष्ट्रपति के शपथ लेने के बाद से ही नित नई वैश्विक घटनाएँ हो रही हैं। इससे वैश्विक परिदृश्य में अस्थिरता बनी हुई है। सभी प्रकार की शक्ति के मामले में विश्व में एक पुनर्संतुलन आकार ले रहा है। वैश्विक मंदी की आहटों के मध्य यूरोपीय संघ के कमज़ोर होने के भी संकेत मिल रहे हैं। इधर भारत वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' बनने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, इसलिये उसे ऐसी विदेश नीति की ज़रूरत है जो इस आकांक्षा से और उपरोक्त वर्णित वैश्विक परिस्थितियों से मेल खाती हो। पर अपनी प्रभावशाली


इन वर्तमान परिस्थितियों में भारत ने अपनी विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए "भारत प्रथम" और "वसुधैव कुटुंबकम" पर ज़ोर दिया है एवं अशांत वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत को "विश्व बंधु" के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य सामने रखा है। जैसे-जैसे ग्लोबल साउथ सहित नए हित समूह, सुधारों की मांग बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे भारत अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये बहुपक्षीय और क्षेत्रीय समूहों का लाभ लेने की योजना बना रहा है। देश अब G-20, ब्रिक्स, आसियान, बिम्सटेक और IORA जैसे मंचों पर अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाने के लिये तैयार है। यह क्षेत्रीय और वैश्विक शासन ढाँचे को आकार देने के लिये भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। नए वर्ष 2025 में, भारत अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों, जैसे कि पड़ोसी प्रथम, एक्ट ईस्ट और थिंक वेस्ट को पूरी गंभीरता के साथ आगे बढ़ाने के लिये तैयार दिखाई दे रहा है, साथ ही वह 'विश्व बंधु' की सच्ची भावना के अनुरूप प्रौद्योगिकी के लिये अमेरिका और यूरोप तथा अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता देगा। वर्ष 2025 भारत के लिये संभावनाओं और चुनौतीयों दोनों से भरा होगा। इस वर्ष क्वाड लीडर्स शिखर सम्मेलन और भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की जाएगी। जून महीने में रियो द जिनेरियो ब्राज़ील में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में भागीदारी करने के साथ जापान, दक्षिण कोरिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ, भारत प्रौद्योगिकी, खान तथा खनिज, कृषि एवं स्वास्थ्य के क्षेत्रों में दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक दोनों तरह के हितों को पूरा करने वाले जुड़ाव को प्राथमिकता देगा। नए साल में कई अन्य मुद्दे साउथ ब्लॉक का ध्यान आकर्षित करेंगे, जैसे ग्लोबल साउथ के एजेंडे और नेतृत्व को आगे बढ़ाना, चौथे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन को आयोजित करने का एक नया प्रयास करना, इंडो-पैसिफिक रणनीति को परिष्कृत करना और ब्रिक्स, जी-7 तथा SCO जैसे बहुपक्षीय संगठनों पर ध्यान केंद्रित करना। इस साल जिन देशों पर विशेष ध्यान देने की संभावना है, उनमें इंडोनेशिया, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, फ्राँस, इटली, अर्जेंटीना, मैक्सिको, यूएई, सऊदी अरब, उज़्बेकिस्तान और ईरान आदि देश शामिल हैं।


फरवरी 2025 में संपन्न प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों देशों ने आपसी विश्वास, साझा हितों, सद्भावना और अपने नागरिकों की सशक्त भागीदारी पर आधारित नई पहल - "21वीं सदी के लिये यू.एस.-इंडिया कॉम्पैक्ट (सैन्य साझेदारी, त्वरित वाणिज्य और प्रौद्योगिकी के लिये अवसरों को उत्प्रेरित करना)" – पर हामी भरी है। रक्षा संबंधों को और आगे बढ़ाने के लिये, इस वर्ष 21वीं सदी में यू.एस.-भारत प्रमुख रक्षा साझेदारी के लिये एक नए दस वर्षीय ढाँचे पर हस्ताक्षर करने की योजना की घोषणा की गई है। यू.एस.-भारत व्यापार संबंधों को गहरा करने के उद्देश्य, से द्विपक्षीय व्यापार हेतु एक साहसिक नया लक्ष्य "मिशन 500" निर्धारित किया है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक कुल द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना से अधिक करके $500 बिलियन करना है। ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिकी पक्ष ने भारत को अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल करने के लिये अपना समर्थन दोहराया, साथ ही प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से भारत में अमेरिकी डिज़ाइन पर परमाणु रिएक्टरों के निर्माण के लिये यू.एस.-भारत 123 असैन्य परमाणु समझौते को साकार करने का संकल्प लिया गया। यू.एस.-भारत ट्रस्ट ("रणनीतिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके संबंधों को बदलना") पहल की शुरुआत की घोषणा की गई। यह पहल रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्द्धचालक, क्वांटम, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग को बढ़ावा देगी। साथ ही वर्ष 2025 को यू.एस.-भारत नागरिक अंतरिक्ष सहयोग के लिये एक महत्त्वपूर्ण वर्ष माना जाएगा, जिसमें भारतीय अंतरिक्ष यात्री को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक भेजने की नासा इसरो की योजना है और संयुक्त ‘निसार’ मिशन का शीघ्र प्रक्षेपण, दोहरे रडार तकनीक वाला अपनी तरह का पहला मिशन है।


भारत ने अपने पुराने और विश्वयसनीय सहयोगी रुस के साथ वर्ष 2030 तक वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा 65 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 100 बिलियन डॉलर करने का संकल्प लिया है। यह प्रतिबद्धता गहरी होती रुस के साथ आर्थिक साझेदारी का संकेत देती है। इसके अतिरिक्त, भारत के येकातेरिनबर्ग और कज़ान में नए वाणिज्य दूतावासों की स्थापना रूस में इसकी बढ़ती रुचि को उजागर करती है। रुस के वल्दाई क्लब में भारत पर गहन चर्चा भारत के रुस के साथ गहरे संबंधों का ही प्रकटीकरण है। वर्ष 2025 में रुस के साथ होने वाली शिखर वार्ता में नए ऊँचाईयाँ देखने को मिल सकती हैं।


वैश्विक परिदृश्य के पश्चात पड़ोसी देशों की स्थिति पर भी एक नज़र डालना समीचीन होगा। बांग्लादेश, सत्ता परिवर्तन के बाद से विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ जल्दबाज़ी का प्रदर्शन कर रहा है। इसलिये वर्ष 2025 में उसके साथ वैदेशिक संबंधों को कुछ समय देना होगा और धैर्य बनाए रखना होगा। इस दिशा में विदेश सचिव विक्रम मिस्री की ढाका यात्रा एक सुविचारित एवं बुद्धिमानी भरी पहल रही है। अब यह ढाका पर निर्भर है कि वह अल्पसंख्यकों पर हमलों, सीमा सुरक्षा मुद्दों और आपसी हित में विकास साझेदारी को जारी रखने के बारे में भारत की प्रमुख चिंताओं को कैसे संबोधित करेगा। नई दिल्ली से अपेक्षा है कि वह हसीना कारक सहित बांग्लादेश की संवेदनशीलताओं का सम्मान करे। नेपाल में केपी ओली सरकार का चीन के प्रति झुकाव है, लेकिन भारत ने इस हिमालयी देश के साथ भौतिक, डिजिटल और लोगों से लोगों के बीच संपर्क साधते हुए पारस्परिक रूप से लाभकारी क्षेत्रीय ढाँचे बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हाल ही में भारत ने नेपाल और बांग्लादेश के साथ मिलकर त्रिपक्षीय बिजली लेन-देन शुरू किया गया है। आशा है कि वर्ष 2025 में भारत, अपनी पड़ोसी प्रथम नीति के तहत प्राथमिकता वाले भागीदार के रूप में नेपाल के बुनियादी ढाँचे, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति से संबंधित विकास के लिये सहायता प्रदान करना जारी रखेगा। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू नवंबर 2023 में 'इंडिया आउट' अभियान के माध्यम से सत्ता में आए, लेकिन लगातार उकसावे के बावजूद भारत ने रणनीतिक धैर्य बनाए रखा और आज, भारत मालदीव के लिये एक "मूल्यवान भागीदार" बन गया है, क्योंकि मुइज्‍ज़ू ने ऋण संकट को टालने में मदद करने के लिये बेलआउट पैकेज की पेशकश के लिये भारत के प्रति आभार व्यक्त किया है। उधर पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर नज़दीकी से निगाह बनाए रखनी होगी पर इस मोर्चे पर कुछ खास बदलाव आने की आशा इस साल नहीं की जा रही है। श्रीलंका के साथ सकारात्मक पहलू यह रहा है कि नए राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने अपने पहले विदेश दौरे के लिये भारत को चुना और इस अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों का अनुसरण किया। भारत ने इस द्वीपीय राष्ट्र को पाँच बिलियन डॉलर के अनुदान और लाइन ऑफ क्रेडिट प्रदान किये हैं, जो दर्शाता है कि भारत इस पड़ोसी को खास सहयोगी मानता है। भूटान के साथ भारत के रिश्ते लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं और इसे राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक की पिछले 20 महीनों में तीन आधिकारिक यात्राओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।


खाड़ी देशों की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कुवैत यात्रा को खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में भारत की दीर्घकालिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। मोदी 43 वर्षों में कुवैत पहुँचने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इसने मोटे तौर पर इस क्षेत्र के साथ अपने जुड़ाव को मज़बूत करने के भारत के प्रयास का संकेत दिया। ऊर्जा के अलावा, भारत बुनियादी ढाँचे के विकास और रोज़गार सृजन के अवसरों को बढ़ावा देने के लिये खाड़ी देशों के साथ व्यापार एवं निवेश में वृद्धि चाहता है। फरवरी 2025 में कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी की भारत यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा गया है।


प्रधानमंत्री मोदी स्वयं एयरपोर्ट पहुँचकर उनका स्वागत करने पहुँचे थे। व्यापार और वाणिज्य के मामले में, खाड़ी देश अमेरिका के बाद भारत के दूसरे सबसे बड़ा व्यापार गंतव्य हैं। वर्ष 2025 में खाड़ी देशों के साथ व्यापार में काफी बढ़ोत्तरी की आशा बनी हुई है।


भारत के आसियान देशों के साथ घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध हैं और अपनी 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत उसने उनके साथ अपने जुड़ाव को बढ़ाया है। वर्ष 2025 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो की गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में नई दिल्ली की यात्रा, इस क्षेत्र में अपनी पहुँच बढ़ाने के भारत के प्रयास को दर्शाती है, जो भारत की इंडो-पैसिफिक के लिये रणनीति के साथ भी मेल खाती है। भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति और आसियान का हिंद-प्रशांत पर दृष्टिकोण (AOIP) दोनों ही स्वतंत्र, खुले तथा नियम-आधारित व्यवस्था, नौवहन एवं उड़ान की स्वतंत्रता, साझा समृद्धि और समावेशिता का समर्थन करते हैं। भारत ने संयुक्त अभ्यास, क्षमता निर्माण पहल और समुद्री डकैती से निपटने के लिये समझौतों के माध्यम से आसियान के साथ अपने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मज़बूत किया है। इसके साथ ही, वर्ष 2025 में भारत और फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया तथा इंडोनेशिया जैसे देशों के बीच रक्षा सहयोग में वृद्धि से नई दिल्ली एवं आसियान देशों के बीच गहन सुरक्षा व रणनीतिक गठबंधन को गति मिल सकती है। फिलीपींस की भारत से 375 मिलियन डॉलर मूल्य की ब्रह्मोस मिसाइलों के नौसैनिक संस्करण की खरीद के बाद, जकार्ता ने भी ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली खरीद में इस साल गहरी रुचि दिखाई है। वियतनाम और मलेशिया भी इसी इसी दिशा में अग्रसर हैं।



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